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हिन्दी साहित्य का इतिहास

आचार्य राम चन्द्र शुक्ल

प्रकाशक : अभ्युदय बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :564
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2533
आईएसबीएन :9788198056007

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हिंदी साहित्य के इतिहास के चार काल

विषय-सूची

कालविभाग

जनता और साहित्य का संबंध, हिंदी साहित्य के इतिहास के चार काल …  21
 

आदिकाल

प्रकरण 1: सामान्य परिचय …23
हिंदी साहित्य का आविर्भाव काल, प्राकृताभास हिंदी के सबसे पराने पद्य. आदिकाल की अवधि, इस काल के आरंभ की अनिर्दिष्ट लोकप्रवृत्ति, रासो' की प्रबंध परंपरा, इस काल की साहित्यिक सामग्री पर विचार, अपभ्रंश परंपरा, देशी भाषा।
प्रकरण 2: अपभ्रंश काव्य …26
अपभ्रंश या लोकप्रचलित काव्यभाषा के साहित्य का आविर्भाव काल, इस काव्यभाषा के विषय, 'अपभ्रंश' शब्द की व्युत्पत्ति, जैन ग्रंथकारों की अपभ्रंश रचनाएँ, इनके छंद, बौद्धों का वज्रयान संप्रदाय, इसके सिद्धों की भाषा, इन सिद्धों की रचना के कुछ नमूने, बौद्ध धर्म का तांत्रिक रूप, 'संध्या भाषा' वज्रयान संप्रदाय का प्रभाव, इसकी महासुख अवस्था, गोरखनाथ के नाथपंथ का मूल, इसकी वज्रयानियों से भिन्नता, गोरखनाथ का समय, नवनाथ, मुसलमानों और भारतीय योगियों का संसर्ग, गोरखनाथ की हठयोग साधना, 'नाथ संप्रदाय' के सिद्धांत, इनका वज्रयानियों से साम्य, 'नाथपंथ' की भाषा, इस पंथ का प्रभाव, इसके ग्रंथ, इन ग्रंथों के विषय, साहित्य के इतिहास में केवल भाषा के विकास की दृष्टि से इनका विचार, ग्रंथकार परिचय, विद्यापति की अपभ्रंश रचनाएँ, अपभ्रंश कविताओं की भाषा।

वीरगाथा काल (संवत् 1050-1375)

प्रकरण 3 : देशभाषा काव्य … 43
देशभाषा काव्यों की प्रामाणिकता में संदेह, इन काव्यों की भाषा और छंद, तत्कालीन राजनीतिक परिस्थिति, वीरगाथाओं का आविर्भाव, इनके दो रूप,'रासो' शब्द की व्युत्पत्ति, ग्रंथ-परिचय, ग्रंथकार-परिचय।
प्रकरण 4: फुटकल रचनाएँ लोकभाषा के पद्य, खुसरो, विद्यापति।

पूर्व-मध्यकाल
भक्तिकाल (संवत् 1375-1700)

प्रकरण 1: सामान्य परिचय … 66
इस काल की राजनीतिक और धार्मिक परिस्थिति, भक्ति का प्रवाह, इसका प्रभाव, सगुण भक्ति की प्रतिष्ठा, हिंदू-मुसलमान दोनों के लिए एक सामान्य भक्तिमार्ग का विकास, इसके मूल स्रोत, नामदेव का भक्तिमार्ग, कबीर का 'निर्गुण पंथ', निर्गुण पंथ और नाथपंथ की अंतस्साधना में भिन्नता, निर्गणोपासना के मूल स्रोत, निर्गुण पंथ का जनता पर प्रभाव, भक्ति के विभिन्न मार्गों पर सापेक्षिक दृष्टि से विचार, कबीर के सामान्य भक्तिमार्ग का स्वरूप, नामदेव, इनकी हिंदी रचनाओं की विशेषता, इन पर नाथपंथी का प्रभाव, इनकी गुरुदीक्षा, इनकी भक्ति के चमत्कार, इनकी निर्गुन बानी, इनकी भाषा, निर्गुन ग्रंथ के मूल स्रोत, इसके प्रवर्तक, निर्गुन धारा की दो शाखाएँ, ज्ञानाश्रयी शाखा और उसका प्रभाव, प्रेममार्गी सूफी शाखा का स्वरूप, सूफी कहानियों का आधार, कवि ईश्वरदास की सत्यवती कथा, सूफियों के प्रेमसंबंधों की विशेषताएँ, कबीर के रहस्यवाद की सूफी रहस्यवाद से भिन्नता, सूफी कवियों की काव्य भाषा, सूफी रहस्यवाद में भारतीय साधनात्मक रहस्यवाद का समावेश।
प्रकरण 2 : निर्गुणधारा … 78
कवि परिचय, निर्गुणमार्गी संत कवियों पर समष्टि रूप से विचार

प्रेममार्गी (सूफी) शाखा

प्रकरण 3 : निर्गुणधारा … 92
कवि परिचय, सूफी कवियों की कबीर से भिन्नता, प्रेमगाथा परंपरा की समाप्ति, सूफी आख्यान काव्य का हिंदू कवि।

रामभक्ति शाखा

प्रकरण 4: सगुणधारा … 109
अद्वैतवाद के विविध स्वरूप, वैष्णव श्री संप्रदाय, रामानंद का समय, इनकी गुरु परंपरा, इनकी उपासना पद्धति, इनकी उदारता, इनके ग्रंथ, इनके वृत्त के संबंध में प्रवाद, इन प्रवादों पर विचार. हनुमानजी की उपासना के ग्रंथ, रामभक्ति काव्यधारा की सबसे बड़ी विशेषता. भक्ति के पूर्ण स्वरूप का विकास, रामभक्ति की श्रृंगारी भावना।

कृष्णभक्ति शाखा

प्रकरण 5: सगुण धारा … 136
वैष्णवधर्म के आंदोलन के प्रवर्तक श्रीबल्लभाचार्य, दार्शनिक सिद्धांत. इनकी प्रेम साधना, इनके अनुसार जीव के तीन भेद, इनके समय की राजनीतिक और धार्मिक परिस्थिति, इनके ग्रंथ, बल्लभ संप्रदाय की उपासना पद्धति का स्वरूप, कृष्णभक्ति काव्य का स्वरूप, वैष्णव धर्म का सांप्रदायिक स्वरूप, देश की भक्तिभावना पर सूफियों का प्रभाव, कवि-परिचय, अष्टछाप की प्रतिष्ठा, कृष्ण भक्ति परंपरा के श्रीकृष्ण, कृष्ण-चरित कविता का रूप।

भक्तिकाल की फुटकल रचनाएँ

प्रकरण 6: सगुण धारा … 170
भक्तिकाव्य प्रवाह उमड़ने का मूल कारण, पठान शासकों का भारतीय साहित्य एवं संस्कृति पर प्रभाव, कवि-परिचय, सूफी रचनाओं के अतिरिक्त भक्तिकाल के अन्य आख्यान काव्य।

उत्तर मध्यकाल
रीतिकाल (संवत् 1700-1900)

प्रकरण 1 : सामान्य परिचय … 198

रीतिकाल के पूर्ववर्ती लक्षण, रीतिपरंपरा का आरंभ, रीति ग्रंथों के आधार. इनकी अखंड परंपरा का आरंभ, संस्कृत रीति ग्रंथों से इनकी भिन्नता, इस भिन्नता का परिणाम, लक्षण ग्रंथकारों के आचार्यत्व पर विचार, इन ग्रंथों के आधार, शास्त्रीय दृष्टि से इनकी विवेचना,रीतिग्रंथकार कवि और उनका उद्देश्य, उनकी कृतियों की विशेषताएँ, साहित्य विकास पर रीति परंपरा का प्रभाव, रीतिग्रंथों की भाषा, रीति कवियों के छंद और रस।

प्रकरण 2 : रीति ग्रंथकार कवि … 205
कवि-परिचय
प्रकरण 3 रीतिकाल के अन्य कवि … 265
इनके काव्य स्वरूप और विषय, रीतिग्रंथकारों से इनकी भिन्नता, इनकी विशेषताएँ, इनके 6 प्रधान वर्ग-(1) श्रृंगारी कवि, (2) कथा प्रबंधकार, (3) वर्णनात्मक प्रबंधकार, (4) सूक्तिकार, (5) ज्ञानोपदेशक पद्यकार, भक्त कवि, वीररस की फुटकल कविताएँ, इस काल का गद्य साहित्य, कवि-परिचय।

आधुनिक काल (संवत् 1900-1925)
गद्य खंड

प्रकरण 1 : सामान्य परिचय : गद्य का विकास

आधुनिक काल के पूर्व गद्य की अवस्था
(ब्रजभाषा गद्य)

गोरखपंथी ग्रंथों की भाषा का स्वरूप, कृष्णभक्ति शाखा के गद्यग्रंथों की भाषा का स्वरूप नाभादास के गद्य का नमूना, उन्नीसवीं शताब्दी में और उसके पूर्व लिखे गये अन्य गद्य के ग्रंथ, इन ग्रंथों की भाषा पर विचार, काव्यों की टीकाओं के ग्रंथ का स्वरूप।

(खड़ी बोली गद्य)

शिष्ट समुदाय में खड़ी बोली के व्यवहार का आरंभ, फारसी मिश्रित खड़ी बोली या रेखता में शायरी, उर्दू साहित्य का आरंभ, खड़ी बोली के स्वाभाविक देशी रूप का प्रसार, खड़ी बोली के अस्तित्व और उसकी उत्पत्ति के संबंध में भ्रम, इस भ्रम का कारण, अपभ्रंश काव्य परंपरा में खड़ी बोली के प्राचीन रूप की झलक, संत कवियों की बानी की खड़ी बोली, गंग कवि के गद्य ग्रंथ में उसका रूप, इस बोली का पहला ग्रंथकार, पं. दौलतराम के अनुवाद ग्रंथ में इसका रूप, 'मंडोवर का वर्णन' में इसका रूप, इसके प्राचीन कथित साहित्य का अनुमान, व्यवहार के शिष्ट भाषा के रूप में इसका ग्रहण, इसके स्वाभाविक रूप का मुसलमानी दरबारी रूप-उर्दू से भिन्नता, गद्य साहित्य में इसके प्रादुर्भाव और व्यापकता का कारण, जान गिल क्राइस्ट द्वारा इसके स्वतंत्र अस्तित्व की स्वीकृति, गद्य की एक साथ परंपरा चलाने वाले चार प्रमुख लेखक-(1) मुंशी सदासुख लाल और उनकी भाषा, (2) इंशा अल्ला खौं और उनकी भाषा, (3) लल्लू लाल और उनकी भाषा, सदासुख लाल की भाषा से इनकी भाषा की भिन्नता, (4) सदल मिश्र और उनकी भाषा, लल्लू लाल की भाषा से इनकी भाषा की भिन्नता। इन चारों लेखकों की भाषा का सापेक्षिक महत्त्व, हिंदी में 'गद्य साहित्य-परंपरा का प्रारंभ, इस गद्य के प्रसार में ईसाइयों का योग, ईसाई धर्म प्रचारकों की भाषा का रूप, मिशन सोसाइटियों द्वारा प्रकाशित पुस्तकों की हिंदी, ब्रह्म समाज की स्थापना; राजा राममोहन राय के 'वेदांतभाष्य-अनुवाद' की हिंदी, 'उदंत मार्तण्ड' पत्र की भाषा, अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार, संवत् 1860 के पूर्व की अदालती भाषा, अदालतों में हिंदी प्रवेश और उसका निष्कासन, उर्दू प्रसार के कारण, काशी और आगरा के समाचारपत्रों की भाषा, शिक्षाक्रम में हिंदी प्रवेश का विरोध, हिंदी-उर्दू के संबंध में गासी द तासी का मत।
प्रकरण 2 : गद्य साहित्य का आविर्भाव … 350
350 हिंदी के प्रति मुसलमान अधिकारियों के भाव, शिक्षोपयोगी हिंदी पुस्तकें, राजा शिवप्रसाद की भाषा, राजा लक्ष्मणसिंह के अनुवादों की भाषा, फ्रेडरिक पिंकाट का हिंदी प्रेम, राजा शिवप्रसाद की 'गुटका' की हिंदी, 'लोकमित्र' और 'अवध अखबार' की भाषा, बाबू नवीनचंद्र राय की हिंदी सेवा, गार्सा द तासी का उर्दू पक्षपात, हिंदी गद्यप्रसार में आर्यसमाज का योग, पं. श्रद्धाराम की हिंदी सेवा, हिंदी सेवा, हिंदी गद्य भाषा का स्वरूपनिर्माण।

आधुनिक गद्य साहित्य परंपरा का प्रवर्तन

प्रकरण 1: गद्य का प्रवर्तन : सामान्य परिचय … 323
सामान्य परिचय  (संवत् 1925-1950)
भारतेंदु का प्रभाव, उनके पूर्ववर्ती और समकालीन लेखकों से उनकी शैली की भिन्नता, गद्य साहित्य पर उनका प्रभाव, खड़ी बोली गद्य की प्रकृत साहित्यिक रूपप्राप्ति, भारतेंदु और उनके सहयोगियों की शैली, इनका दृष्टिक्षेत्र और मानसिक अवस्थान, हिंदी का आरंभिक नाट्य साहित्य, इसका परवर्ती उपन्यास साहित्य, भारतेंदु के जीवनकाल की पत्र-पत्रिकाएँ।
प्रकरण 2: गद्य का प्रवर्तन … 360

प्रथम उत्थान

भारतेंदु हरिश्चंद्र-उनकी जगन्नाथ यात्रा, उनका पहला अनूदित नाटक, उनकी पत्र-पत्रिकाएँ, 'हरिश्चंद्र चंद्रिका' की भाषा, इस चंद्रिका के सहयोगी. इसके मनोरंजक लेख, भारतेंदु के नाटक, इनकी विशेषताएँ, इनकी सर्वतोन्मुखी प्रतिभा, उनके सहयोगी, उनकी शैली के दो रूप, पं. प्रतापनारायण मिश्र-भारतेंदु से उनकी शैली की विभिन्नता, उनका पक्ष, उनके विषय, उनके नाटक, पं. बालकृष्ण भट्ट, उनका 'हिंदी प्रदीप', उनकी शैली, उनके गद्यप्रबंध, उनके नाटक, पं. बदरीनारायण चौधरी, उनकी शैली की विलक्षणता, उनके नाटक, उनकी पत्र-पत्रिकाएँ, समालोचना का सूत्रपात, लाला श्रीनिवासदास, उनके नाटक, उनका उपन्यास। ठाकुर जगमोहन सिंह-उनका प्रकृति प्रेम, उनकी शैली की विशेषता। बाबू तोताराम, उनका पत्र, उनकी हिंदी सेवा। भारतेंदु के अन्य सहयोगी, हिंदी का प्रचारकार्य, इसमें बाधाएँ, भारतेंदु और उनके सहयोगियों का उद्योग, काशी नागरीप्रचारिणी सभा की स्थापना, पं. गादित्त का प्रचारकार्य, सभा द्वारा नागरी उद्धार के लिए उद्योग, सभा के साहित्यिक आयोजन, सभा की स्थापना के बाद की चिंता और व्यग्रता।
प्रकरण 3: गद्य साहित्य का प्रसार … 391

द्वितीय उत्थान  (संवत् 1950-75)

सामान्य परिचय इस काल की चिंताएँ और आकांक्षाएँ, इस काल के लेखकों की भाषा, इनके विषय और शैली, इस काल के नाटक, निबंध, समालोचना और जीवनचरित।
प्रकरण 4: गद्य साहित्य का प्रसार … 391
नाटक, बंग भाषा से अनूदित, अँगरेजी और संस्कृत से अनूदित, मौलिक, उपन्यास, अनूदित, मौलिक, छोटी कहानियाँ, आधुनिक कहानियों का स्वरूप विकास, पहली मौलिक कहानी, अन्य भावप्रधान कहानियाँ, हिंदी की सर्वश्रेष्ठ कहानी, प्रेमचंद का उदय, निबंध, इसके भेद, इसका आधुनिक स्वरूप, निबंध लेखक की तत्त्वचिंतक या वैज्ञानिक से भिन्नता, निबंध परंपरा का आरंभ, दो अनूदित ग्रंथ, निबंध का लेखक-परिचय, समालोचना, भारतीय समालोचना का उद्देश्य, यूरोपीय समालोचना, हिंदी में समालोचना साहित्य
का विकास।
प्रकरण 5 : गद्य साहित्य की वर्तमान गति … 426

तृतीय उत्थान (संवत् 1975 से)

सामान्य परिचय परिस्थिति दिग्दर्शन, लेखकों और ग्रंथकारों की बढ़ती संख्या का परिणाम. कुछ लोगों की अनधिकार चेष्टा, आधुनिक भाषा का स्वरूप, गद्य साहित्य के विविध अंगों का संक्षिप्त विवरण और उनकी प्रवृत्तियाँ, (1) उपन्यास और कहानी, (2) छोटी कहानियाँ, (3) नाटक, (4) निबंध, (5) समालोचना और काव्यमीमांस।

आधुनिक काल
काव्यखंड (संवत् 1900-1925)

प्रकरण 1 : काव्यखंड पुरानी धारा …459
प्राचीन काव्य परंपरा, ब्रजभाषा काव्यपरंपरा के कवियों का परिचय, पुरानी परिपाटी से संबंध रखने के साथ ही साहित्य की नवीन गति प्रवर्तन में योग देने वाले कवि, भारतेंदु द्वारा भाषा परिष्कार का कार्य, उनके द्वारा स्थापित कवि समाज, उनके भक्ति श्रृंगार का पद, कवि-परिचय।
प्रकरण 2 : काव्यखंड : नयी धारा …468

प्रथम उत्थान (संवत् 1925-50)

काव्यधारा का क्षेत्र विस्तार, विषयों की अनेकरूपता और उनके विधान में परिवर्तन, इस काल के प्रमुख कवि, भारतेंदु वाणी का उच्चतम स्वर, उनके काव्य विषय और विधान का ढंग, प्रतापनारायण मिश्र के पद्यात्मक निबंध, बदरीनारायण चौधरी का कार्य, कविता में प्राकृतिक दृश्यों को संश्लिष्ट
योजना, नये विषयों पर कविता।
प्रकरण 3 : काव्यखंड : नयी धारा …477

द्वितीय उत्थान (संवत् 1950-75)

 पं. श्रीधर पाठक की कथा की सार्वभौम मार्मिकता, ग्रामगीतों की मार्मिकता, प्रकृत स्वच्छंदतावाद का स्वरूप, हिंदी काव्य में 'स्वच्छंदता' की प्रवृत्ति का सर्वप्रथम आभास, इसमें अवरोध, इस अवरोध की प्रतिक्रिया, श्रीधर पाठक; हरिऔध, महावीरप्रसाद द्विवेदी, द्विवेदी मंडल के कवि, इस मंडल के बाहर
की काव्यभूमि।
प्रकरण 4 : काव्यखंड : नयी धारा … 506

तृतीय उत्थान (संवत् 1975 से ...)

वर्तमान काव्यधाराएँ : सामान्य परिचय खड़ी बोली के पद्य के तीन रूप और उनका सापेक्षिक महत्त्व, हिंदी के नये छंदों पर विचार, काव्य के वस्तविधान और अभिव्यंजनशैली में प्रकट होनेवाली प्रवृत्तियाँ, खड़ी बोली में काव्यत्व का स्फुरण, वर्तमान काव्य पर काल का प्रभाव, चली आती हई काव्यपरंपरा के अवरोध के लिए प्रतिक्रिया, नूतन परंपरा प्रवर्तक कवि. इनकी विशेषताएँ, इनका वास्तविक लक्ष्य, रहस्यवाद, प्रतीकवाद और छायावाद, हिंदी में छायावाद का स्वरूप और परिणाम, भारतीय काव्यधारा से इनका पार्थक्य, इसकी उत्पत्ति का मूल स्रोत, 'छायावाद' शब्द का अनेकार्थी प्रयोग, 'छायावाद' के साथ ही यूरोप के अन्य वादों के प्रर्वतन की अनधिकार चेष्टा, 'छायावाद' की कविता का प्रभाव, आधुनिक कविता की अन्य धाराएँ, स्वाभाविक स्वच्छंदता की ओर प्रवृत्त कवि, खड़ी बोली पद्य की तीन धाराएँ, ब्रजभाषा काव्यपरंपरा, द्विवेदी काल में परिवर्तित हई खड़ी बोली काव्यधारा, इस धारा के प्रमुख कवि, छायावाद का प्रारंभ, इसका स्वरूप, इसके दो अर्थ, इन अर्थों के अनुसार छायावादी कवियों का वर्गीकरण, इनकी कविता का स्परूप, कवि-परिचय, अन्य उल्लेख्य कवि, स्वच्छंद धारा और उसके कवि।

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