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बीए सेमेस्टर-1 प्राचीन भारतीय इतिहास

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :250
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2636
आईएसबीएन :0

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बीए सेमेस्टर-1 प्राचीन भारतीय इतिहास


PART - A

अध्याय - 1

प्राचीन भारतीय इतिहास अध्ययन के स्रोत

(Sources of Ancient Indian History studies)

 

प्रश्न- प्राचीन भारतीय इतिहास को समझने हेतु उपयोगी स्रोतों का वर्णन कीजिए।

अथवा
प्राचीन भारतीय इतिहास जानने के विभिन्न स्रोतों का उल्लेख कीजिए।
अथवा
भारतीय इतिहास जानने के साधनों को स्पष्ट कीजिए।
सम्बन्धित लघु प्रश्न
1. प्राचीन इतिहास जानने के साहित्यिक साक्ष्य बताइये।
2. प्राचीन भारतीय इतिहास को समझने में पुरातात्विक साक्ष्य कहाँ तक उपयोगी हैं? 3. प्राचीन इतिहास को जानने हेतु विदेशी यात्रियों के विवरण से हमें किस प्रकार सहायता मिलती है? स्पष्ट कीजिए।
4. भारतीय इतिहास के प्रमुख स्रोतों का उल्लेख कीजिए।
अथवा
प्राचीन भारतीय इतिहास के कौन-कौन से स्रोत हैं?
5. पुरातात्विक साक्ष्यों में अभिलेखीय साक्ष्य द्वारा इतिहास की कैसे और किसकी जानकारी प्राप्त होती है?
6. लेखन में मुद्रा सम्बन्धी साक्ष्यों के महत्व की विवेचना कीजिए।
7. प्राचीन भारतीय इतिहास ज्ञात करने के साधनों को समझाइये।
8. प्राचीन भारतीय इतिहास को जानने के पुरातात्विक स्रोत क्या हैं?

उत्तर -

प्राचीन भारतीय इतिहास जानने के साधन

भारत का प्राचीन इतिहास अत्यन्त गौरवपूर्ण रहा है। यद्यपि दुर्भाग्यवश हमें अपने प्राचीन इतिहास के पुननिर्माण के लिए उपयोगी सामग्री बहुत कम मिलती है फिर भी यदि हम सावधानीपूर्वक अपने प्राचीन साहित्यिक ग्रन्थों की छानबीन करें तो उनमें हमें अपने इतिहास के पुननिर्माणार्थ अनेक महत्वपूर्ण सामग्रियाँ उपलब्ध होंगी। इसके अतिरिक्त भारत में समय-समय पर विदेशों से आने वाले यात्रियों के भ्रमण - वृतान्त भी प्राचीन इतिहास के विषय में अनेक उपयोगी सामग्रियाँ प्रदान करते हैं। इसी प्रकार पुरातत्वेत्ताओं ने अतीत के खण्डहरों से अनेक ऐसी वस्तुएँ खोज निकाली हैं जो हमें प्राचीन इतिहास विषयक महत्वपूर्ण सूचनाएँ प्रदान करती हैं। अतः हम सुविधा की दृष्टि से भारतीय इतिहास जानने के साधनों को निम्नलिखित तीन वर्गों में रख सकते हैं -

1. साहित्यिक स्रोत -

साहित्यिक स्रोत के अन्तर्गत धार्मिक साहित्य तथा लौकिक साहित्य आते हैं। धार्मिक साहित्य में ब्राह्मण तथा ब्राह्मणेतर ग्रन्थों की चर्चा की जाती है और लौकिक साहित्य में एतिहासिक ग्रन्थों, जीवनियों, कल्पना-प्रधान तथा गल्प साहित्य का वर्णन किया जाता है। इन स्रोतों को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है

(i) ब्राह्मण साहित्य- ब्राह्मण ग्रन्थों में वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत तथा पुराण आते हैं। इनका विवरण निम्नवत् है -

  (अ) वेद वेद भारत के सबसे प्राचीन धर्मग्रन्थ हैं। वैदिक युग की सांस्कृतिक दशा के ज्ञान का एकमात्र स्रोत होने के कारण वेदों का ऐतिहासिक महत्व बहुत अधिक है। प्राचीन काल के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण सभी सामग्री हमें प्रचुर मात्रा में वेदों से प्राप्त हो जाती हैं। वेदों की संख्या चार है ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद। इन वेदों में ऋग्वेद समस्त आर्य जाति की प्राचीनतम रचना है। इस प्रकार यह भारत तथा भारतेत्तर प्रदेश के आर्यों के इतिहास, भाषा, धर्म एवं उनकी सामान्य संस्कृति पर प्रकाश डालता है। यजुर्वेद या सामवेद से कोई विशेष जानकारी प्राप्त नहीं होती है। अथर्ववेद का ऐतिहासिक दृष्टि से विशेष महत्व है। इसमें सामान्य मनुष्यों के विचारों तथा अन्धविश्वासों का विवरण मिलता है। इसमें मानव जीवन के सभी पक्षों, जैसे गृह-निर्माण, कृषि की उन्नति, रोग निवारण, समन्वय, विवाह तथा प्रणय गीतों, राजभक्ति, राजा का चुनाव, विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों तथा औषधियों आदि का विवरण मिलता है। इसके कुछ मन्त्रों में जादू-टोने का भी उल्लेख है जिससे इस बात की जानकारी प्राप्त होती है कि इस समय तक आर्य-अनार्य संस्कृतियों का समन्वय हो रहा था तथा आर्यों ने अनार्यों के कई सामाजिक एवं धार्मिक रीति-रिवाजों एवं विश्वासों को ग्रहण कर लिया था।

(ब) ब्राह्मण, आरण्यक तथा उपनिषद् - वेदों के पश्चात् ब्राह्मणों, आरण्यकों तथा उपनिषदों का स्थान है। इनसे उत्तर वैदिक युग के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन के विषय में अच्छी जानकारी प्राप्त होती है। ऐतरेय, शतपथ, तैत्तिरीय, पंचविश, गोपथ आदि ब्राह्मण ग्रन्थ वैदिक संहिताओं की व्याख्या करने के लिए गद्य में लिखे गये हैं। इनसे हमें परीक्षित के बाद विम्बिसार के पूर्व की घटनाओं का ज्ञान प्राप्त होता है। ऐतरेय में राज्याभिषेक के नियम तथा कुछ प्राचीन राजाओं के नाम दिये गये हैं। शतपथ में गन्धार, शल्य, कुरु, पांचाल, कोसल, विदेह आदि के राजाओं का उल्लेख मिलता है। प्राचीन इतिहास के स्रोत के रूप में वैदिक साहित्य के बाद शतपथ ब्राह्मण का स्थान है। कर्मकाण्डों के अतिरिक्त इसमें सामाजिक विषयों का भी वर्णन है। इसी प्रकार आरण्यक तथा उपनिषद भी प्राचीन इतिहास के विषय में जानकारी प्रदान करते हैं। यद्यपि ये मुख्यतः दार्शनिक ग्रन्थ हैं जिनका उद्देश्य ज्ञान की खोज करना है।

(स) वेदांग तथा सूत्र वेदों को समझने के लिए छः वेदांगों शिक्षा, ज्योतिष, कल्प, व्याकरण, निरुक्त तथा छन्द की रचना की गयी। इनसे वेदों के शुद्ध उच्चारण तथा यज्ञादि करने में सहायता प्राप्त होती थी। इसी प्रकार वैदिक साहित्य को सदा बनाये रखने के लिए सूत्र साहित्य की रचना की गयी। श्रौत गृह्य तथा धर्मसूत्रों के अध्ययन से हम यज्ञीय विधि-विधानों, कर्मकाण्डों तथा राजनीति, विधि एवं व्यवहार से सम्बन्धित अनेक महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त करते हैं।

(द) महाकाव्य रामायण एवं महाभारत भारत के सम्पूर्ण धार्मिक साहित्य में रामायण एवं महाभारत का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। इनके अध्ययन से हमें प्राचीन हिन्दू संस्कृति के विविध पक्षों का सुन्दर ज्ञान प्राप्त होता है। इन महाकाव्यों द्वारा प्रतिपादित आदर्श तथा मूल्य सार्वभौम मान्यता रखते हैं। महर्षि बाल्मीकि द्वारा रचित रामायण आदिकाव्य है जिससे हमें हिन्दू तथा यवनों और शकों के संघर्ष का विवरण प्राप्त होता है। इसमें यवन देश तथा शकों के नगर को कुरु तथा मद्र देश और हिमालय के बीच स्थित बताया गया है। इससे ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि उन दिनों यूनानी तथा सीथियन लोग पंजाब के कुछ भागों में बसे हुये थे। इसी प्रकार वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत से प्राचीन भारत की सामाजिक, धार्मिक तथा राजनैतिक दशा का परिचय मिलता है। प्राचीन राजनीति तथा शासन की जानकारी हेतु महाभारत में बहुमूल्य सामग्रियों का भण्डार है।

(य) पुराण भारतीय ऐतिहासिक कथाओं का सबसे उत्तम और क्रमबद्ध विवरण पुराणों से प्राप्त होता है। इनकी संख्या 18 है। अट्ठारह पुराणों में से केवल पाँच में (मत्स्य, वायु, विष्णु, ब्रह्माण्ड, भागवत) ही प्राचीन राजाओं की वंशावली पायी जाती है। इनमें मत्स्य पुराण सबसे अधिक प्राचीन एवं प्रामाणिक है। पुराणों से हमें प्राचीन काल से लेकर गुप्तकाल के इतिहास से सम्बन्धित अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं के विषय में जानकारी प्राप्त हो जाती है। छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व के पहले के प्राचीन भारतीय इतिहास के पुनर्निमाण के लिए पुराणों को ही एकमात्र स्रोत माना जाता है।

(ii) ब्राह्मणेतर साहित्य

ब्राह्मणेतर साहित्य में बौद्ध तथा जैन साहित्यों से सम्बन्धित रचनाओं का उल्लेख किया जा सकता है। इनका विवरण निम्नवत है

(अ) बौद्ध ग्रन्थ बौद्ध ग्रन्थों में 'त्रिपिटक' सबसे महत्वपूर्ण हैं। बुद्ध की मृत्यु के बाद उनके द्वारा दी गई शिक्षाओं को तीन भागों विनयपिटक, सुत्तपिटक तथा अभिधम्मपिटक में बाँटा गया, जिन्हें त्रिपिटक कहा गया। त्रिपिटकों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये बौद्ध संघों के संगठन का पूर्ण विवरण प्रस्तुत करते हैं। इसके अतिरिक्त निकाय तथा जातक आदि से भी हमें बहुत-सी सामग्री उपलब्ध होती है। जातकों से बुद्ध के पूर्व जन्म के बारे में पता चलता है। कुछ जातक ग्रन्थों में बुद्ध के समय की राजनीतिक अवस्था का विवरण मिलता है जिससे समाज और सभ्यता के विभिन्न पहलुओं का परिचय मिलता है। पाली भाषा का एक अन्य महत्वपूर्ण ग्रन्थ 'मिलिन्दपण्हो' है जिससे हिन्द-यवन शासक मेनाण्डर के विषय में सूचनाएँ मिलती हैं।

(ब) जैन ग्रन्थ जैन साहित्य का दृष्टिकोण भी बौद्ध साहित्य के समान ही धर्मपरक है। जैन ग्रन्थों में परिशिष्टपर्वन् भद्रबाहुचरित, आवश्यकसूत्र, भगवतीसूत्र, कालिकापुराण आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनसे अनेक ऐतिहासिक घटनाओं की सूचना मिलती है। जैन धर्म का प्रारम्भिक इतिहास 'कल्पसूत्र' से ज्ञात होता है। परिशिष्टपर्वन् तथा भद्रबाहुचरित से चन्द्रगुप्त मौर्य के जीवन की प्रारम्भिक तथा उत्तरकालीन घटनाओं की सूचना मिलती है। भगवतीसूत्र से महावीर के जीवन, कृत्यों तथा अन्य समकालिकों के साथ उनके सम्बन्धों का विस्तृत विवरण मिलता है। इसी प्रकार आचारांगसूत्र से जैन भिक्षुओं के आचार-नियमों का पता चलता है। जैन साहित्य में पुराणों का भी महत्वपूर्ण स्थान है, जिन्हें 'चरित' भी कहा जाता है। इनमें पद्मपुराण, हरिवंशपुराण, आदिपुराण इत्यादि महत्वपूर्ण हैं। यद्यपि इनमें मुख्य रूप से कथाएँ दी गई हैं फिर भी इनके अध्ययन से विभिन्न कालों की सामाजिक, राजनीतिक एवं धार्मिक दशा का बहुत कुछ ज्ञान प्राप्त हो जाता है।

(iii) लौकिक साहित्य लौकिक साहित्य के अन्तर्गत ऐतिहासिक एवं अर्द्ध- ऐतिहासिक ग्रन्थों तथा जीवनियों का विशेष रूप से उल्लेख किया जा सकता है -

(अ) ऐतिहासिक ग्रन्थ ऐतिहासिक रचनाओं में सर्वप्रमुख ग्रन्थ कौटिल्य (चाणक्य) का 'अर्थशास्त्र' है जिससे हमें मौर्यकालीन इतिहास एवं राजनीति के विषय में जानकारी प्राप्त होती है। इस ग्रन्थ से चन्द्रगुप्त मौर्य की शासन व्यवस्था पर प्रचुर मात्रा में प्रकाश पड़ता है। ऐतिहासिक रचनाओं में सर्वाधिक महत्व कल्हण द्वारा विरचित 'राजतरंगिणी' का है। इसमें आदिकाल से लेकर 1151 ई. के आरम्भ तक के कश्मीर के प्रत्येक राजा के समय की घटनाओं का क्रमानुसार विवरण दिया गया है। इसी प्रकार सोमेश्वर कृत 'रसमाला' तथा 'कीर्तिकौमुदी, मेरुतुंग कृत 'प्रबन्धचिन्तामणि, राजशेखर कृत 'प्रबन्धकोश' आदि से हमें गुजरात के चालुक्य वंश के इतिहास एवं संस्कृति का विवरण प्राप्त होता है।

(ब) अर्द्ध-ऐतिहासिक ग्रन्थ अर्द्ध- ऐतिहासिक रचनाओं में पाणिनी का 'अष्टाध्यायी', कात्यायन का 'वार्तिक', 'गार्गीसंहिता, पंतजलि का 'महाभाष्य' विशाखदत्त का 'मुद्राराक्षस' तथा कालिदास का मालविकाग्निमित्र' इत्यादि अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। कात्यायन तथा पाणिनी के व्याकरण ग्रन्थों से मौर्यों के पहले के इतिहास तथा मौर्ययुगीन राजनीतिक अवस्था पर प्रकाश पड़ता है। इनसे उत्तर भारत के भूगोल की भी जानकारी होती है। 'गार्गीसंहिता' से भारत पर होने वाले यवन आक्रमण का पता चलता है। 'मुद्राराक्षस' से चन्द्रगुप्त मौर्य के विषय में सूचना मिलती है। इसी प्रकार 'मालविकाग्निमित्र' से शुंगकालीन राजनीतिक परिस्थितियों का विवरण मिलता है।

(स) ऐतिहासिक जीवनी ऐतिहासिक जीवनियों में बाणभट्ट का 'हर्षचरित' विल्हण का 'विक्रमांकदेवचरित', अश्वघोष का 'बुद्धचरित' हेमचन्द्र का 'कुमारपालचरित' जयानक जयानक का 'पृथ्वीराजविजय' आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। 'हर्षचरित' से सम्राट हर्षवर्द्धन के जीवन तथा तत्कालीन समाज के विषय में सूचनाएँ प्राप्त होती हैं। 'विक्रमांकदेवचरित' कल्याणी के चालुक्यवंशी नरेश विक्रमादित्य षष्ठ के चरित्र का विवरण प्रस्तुत करता है। 'बुद्धचरित' में गौतम बुद्ध के चरित्र का विस्तृत वर्णन हुआ है। इसी प्रकार 'पृथ्वीराजविजय' से चाहमान राजवंश के इतिहास का ज्ञान प्राप्त होता है।

उत्तर भारत के समान दक्षिण भारत से भी अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ प्राप्त हुये हैं जिनसे वहाँ शासन करने वाले कई राजवंशों के इतिहास एवं संस्कृति के बारे में ज्ञान प्राप्त होता है।

2. विदेशी यात्रियों के विवरण

प्राचीन भारत के इतिहास को जानने में विदेशी यात्रियों के विवरण से हमें पर्याप्त सहायता मिलती है। भारत में आने वाले विदेशी यात्रियों एवं लेखकों में से कुछ ने तो भारत में रहकर अपने स्वयं के अनुभव से इतिहास के विषय में लिखा तथा कुछ ने जनश्रुतियों एवं भारतीय ग्रन्थों को अपने विवरण का आधार बनाया। इन लेखकों में यूनानी, चीनी तथा अरबी-फारसी लेखक विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनका विवरण निम्नवत् है

1. यूनानी रोमन लेखक - यूनान के प्राचीनतम लेखकों में हेरोडोटस का नाम प्रसिद्ध है। उसने अपनी पुस्तक 'हिस्टोरिका (Historica) में पाँचवी शताब्दी ईसा पूर्व के भारत-फारस के सम्बन्ध का वर्णन किया है। परन्तु उसका विवरण अधिकांशत: अनुश्रुतियों तथा अफवाहों पर आधारित है। सिकन्दर के साथ आने वाले लेखकों में नियार्कस, आनेसिक्रिटस तथा आरिस्टोबुलस के विवरण अपेक्षाकृत अधिक प्रामाणिक एवं विश्वसनीय हैं। चूँकि इन लेखकों का उद्देश्य अपनी रचनाओं के द्वारा अपने देशवासियों को भारतीयों के विषय में जानकारी देना था, अतः इनका विवरण यथार्थ है। सिकन्दर के बाद मेगस्थनीज, डाइमेक्स तथा डायोनिसियस के नाम उल्लेखनीय हैं जो यूनानी शासकों द्वारा पाटलिपुत्र के मौर्य दरबार में भेजे गये थे। इनमें मेगस्थनीज सर्वाधिक प्रसिद्ध है। वह चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया था। उसने 'इण्डिका' (Indica ) नामक पुस्तक में मौर्ययुगीन समाज एवं संस्कृति के विषय में लिखा है। इण्डिका यूनानियों द्वारा भारत के सम्बन्ध में प्राप्त ज्ञानराशि में सबसे अमूल्य रत्न है। अन्य ग्रन्थों में 'पेरीप्लस ऑफ द इरिथ्रयन-सी (Periplus of the Erythrean Sea), टालमी का भूगोल, प्लिनी का 'नेचुरल हिस्ट्री' (Natural History) आदि का भी उल्लेख किया जा सकता है। पेरीप्लस का लेखक 80 ई. के लगभग हिन्द महासागर की यात्रा पर आया था। उसने तत्कालीन बन्दरगाहों तथा व्यापारिक वस्तुओं का विवरण दिया है। प्राचीन भारत के समुद्री व्यापार की जानकारी के लिये उसका विवरण बहुत उपयोगी है। दूसरी शताब्दी ईस्वी में टालमी ने भारत का भूगोल लिखा था। प्लिनी का ग्रन्थ प्रथम शताब्दी ईस्वी का है। इस ग्रन्थ से भारत के प्राचीन पशुओं, पेड़-पौधों, खनिज पदार्थों आदि के विषय में ज्ञान प्राप्त होता है।

2. चीनी लेखक - प्राचीन भारतीय इतिहास को समझने में चीनी यात्रियों के विवरण भी विशेष उपयोगी रहे हैं। ये चीनी यात्री बौद्ध मतानुयायी थे तथा भारत में बौद्ध तीर्थ स्थानों की यात्रा और बौद्ध धर्म के विषय में जानकारी प्राप्त करने के उद्देश्य से आये थे। इनमें चार के नाम विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं फाहियान, सुंगयुन, हवेनसांग तथा इत्सिंग। फाहियान, गुप्त नरेश चन्द्रगुप्त द्वितीय 'विक्रमादित्य' के दरबार में आया था। उसने अपने विवरण में मध्यदेश के समाज एवं संस्कृति का वर्णन किया है। सुंगयुन 518 ई. में भारत आया और उसने अपने तीन वर्ष की यात्रा में बौद्ध ग्रन्थों की प्रतियाँ एकत्रित की हवेनसांग हर्षवर्द्धन के शासनकाल में (629 ई. लगभग) भारत आया था। उसने 16 वर्षों तक यहाँ निवास किया और विभिन्न स्थानों की यात्रा की। उसका भ्रमण वृतान्त 'सि यू की' नाम से प्रसिद्ध है जिसमें 138 देशों का विवरण मिलता है। इससे हर्षकालीन भारत के समाज, धर्म तथा राजनीति पर सुन्दर प्रकाश पड़ता है। भारतीय संस्कृति के इतिहास में हह्वेनसांग ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इत्सिंग सातवीं शताब्दी के अन्त में भारत आया था। उसके विवरण से नालन्दा विश्वविद्यालय, विक्रमशिला विश्वविद्यालय तथा तत्काली भारत के विषय में जानकारी प्राप्त होती हैं।

3. अरबी लेखक - अरब के यात्रियों तथा लेखकों के विवरण से हमें पूर्वमध्यकालीन भारत के समाज एवं संस्कृति के विषय में ज्ञान प्राप्त होता है। अरबी लेखकों में अल्बरूनी का नाम सर्वप्रसिद्ध है। गणित, विज्ञान एवं ज्योतिष के साथ ही साथ वह अरबी, फारसी एवं संस्कृत भाषाओं का भी अच्छा ज्ञात था। वह महमूद गजनवी के साथ भारत आया था किन्तु उसका दृष्टिकोण महमूद से पूर्णतया भिन्न था और वह भारतीयों का निन्दक न होकर उनकी बौद्धिक सफलताओं का महान प्रशंसक था। भारतीय संस्कृति के अध्ययन में उसकी गहरी रुचि थी तथा गीता से वह विशेष रूप से प्रभावित हुआ। उसने भारतीयों से जो कुछ सुना उसी के आधार पर उनकी सभ्यता का विवरण प्रस्तुत कर दिया। अपनी पुस्तक 'तहकीक-ए- हिन्द ( भारत की खोज) में उसने यहाँ के निवासियों की दशा का वर्णन किया है। इससे राजपूतकालीन समाज, धर्म, रीति-रिवाज, राजनीति आदि पर सुन्दर प्रकाश पड़ता है। अल्बरूनी के अतिरिक्त अल- बिलादुरी, सुलेमान, अल-मसऊदी, हसन निजाम, फरिश्ता, निजामुद्दीन आदि मुसलमान लेखकों की कृतियों से भी प्राचीन भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त होती हैं।

इस प्रकार विदेशी यात्रियों के विवरण प्राचीन भारतीय इतिहास को समझने में हमारी विशेष रूप से सहायता करते हैं। इन विवरणों के आधार पर हम भारत के प्राचीन इतिहास का पुननिर्माण कर सकते हैं।

 

3. पुरातात्विक स्रोत

पुरातात्विक स्रोत के अन्तर्गत पृथ्वी के गर्भ में छिपी हुयी सामग्रियों को शामिल किया जाता है। प्राचीन इतिहास के ज्ञान के लिये पुरातात्विक प्रमाणों से बहुत अधिक सहायता मिलती है। पुरातत्व के अन्तर्गत निम्नलिखित प्रकार के साक्ष्य आते हैं 

(i) अभिलेख प्राचीन इतिहास के पुनर्निर्माण में अभिलेखों से बहुत सहायता मिलती है। बहुत से अभिलेख पाषाण शिलाओं, स्तम्भों, ताम्रपत्रों, दीवारों, मुद्राओं एवं प्रतिमाओं आदि पर खुदे हुये प्राप्त हुये हैं। मध्य ऐशिया के बोघजकोई से प्राप्त अभिलेख सबसे प्राचीन अभिलेखों में है। यह हित्ती नरेश सप्पिलुल्युमा तथा मितन्नी नरेश मतिवजा के बीच सन्धि का उल्लेख करता है। अपने यथार्थ रूप में अभिलेख अशोक के समय से ही हमें प्राप्त होते हैं। अशोक के समय के कई स्तम्भ लेखों एवं शिलालेखों से उसके साम्राज्य की सीमा, उसके धर्म तथा शासन नीति से सम्बन्धित अनेक महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त होती हैं। अशोक के बाद भी अभिलेखों की परम्परा कायम रही है। ऐसे लेखों में खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख, रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख, समुद्रगुप्त का प्रयागस्तम्भ लेख, यशोधर्मन् का मन्दसोर अभिलेख, पुलकेशिन द्वितीय का एहोल अभिलेख, भोज का ग्वालियर अभिलेख अदि विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। इनमें से अधिकांश लेखों से तत्सम्बन्धी राजाओं और उनके सैनिक अभियानों के विषय में पता चलता है। कुछ अभिलेख ताम्रपत्रों, मूर्तियों आदि के ऊपर खुदे हुए मिले हैं। इनसे भी प्राचीन इतिहास के विषय में अनेक महत्वपूर्ण सूचनाएँ प्राप्त होती हैं।

(ii) मुद्रायें अथवा सिक्के भारतीय इतिहास के स्रोत के रूप में मुद्राओं अथवा सिक्कों को महत्वपूर्ण पुरातात्विक साक्ष्य माना जाता है। यद्यपि भारत में सिक्कों की प्रचीनता आठवीं शती ईसा पूर्व तक मानी जाती है तथापि ईसा पूर्व छठी शताब्दी से ही हमें सिक्के प्राप्त होने लगते हैं। साधारणतया 206 ईसा पूर्व से लेकर 300 ई. तक के भारतीय इतिहास का ज्ञान हमें मुख्य रूप से मुद्राओं की सहायता से ही होता है। कुछ मुद्राओं पर तिथियाँ भी खुदी मिली हैं जो कालक्रम के निर्धारण में सहायक सिद्ध हुयी हैं। इन मुद्राओं से तत्कालीन आर्थिक दशा तथा सम्बन्धित राजाओं की साम्राज्य- सीमा का भी ज्ञान होता है। किसी काल में सिक्कों की बहुलता देखकर हम इस बात का अनुमान लगा सकते हैं कि उस समय व्यापार वाणिज्य विकसित दशा में था। सिक्कों की कमी को व्यापार-वाणिज्य की अवनति का सूचक माना जा सकता है। मुद्राओं के अध्ययन से हमें सम्राटों के धर्म तथा उनके व्यक्तित्व के विषय में पता चलता है। उदाहरण के लिये, हम कनिष्क तथा समुद्रगुप्त की मुद्राओं को ले सकते हैं। कनिष्क के सिक्कों से इस बात की जानकारी होती है कि वह बौद्ध धर्म का अनुयायी था। समुद्रगुप्त अपनी कुछ मुद्राओं पर वीणा बजाते हुए दिखाया गया है जिससे यह पता चलता है कि वह संगीत प्रेमी था। इसी प्रकार इण्डो-बैक्ट्रियन, इण्डो-यूनानी तथा इण्डो- सीथियन शासकों के इतिहास के प्रमुख स्रोत सिक्के ही हैं।

(iii) स्मारक इसके अन्तर्गत मन्दिर, मूर्तियाँ, प्राचीन इमारतें इत्यादि आती हैं। मन्दिर, विहारों तथा स्तूपों से समाज के आध्यात्मिक एवं धर्मनिष्ठ भावना का पता चलता है। विभिन्न स्थानों से प्राप्त सामग्रियों से प्राचीन इतिहास के विभिन्न पहलुओं पर सुन्दर प्रकाश पड़ता है। देवगढ़ का मन्दिर, भीतरगाँव का मन्दिर, अजन्ता की गुफाओं के चित्र, नालन्दा की बुद्ध की ताम्रमूर्ति आदि से हिन्दू कला एवं सभ्यता के पर्याप्त विकसित होने के प्रमाण मिलते हैं। दक्षिण भारत से भी अनेक स्मारक प्राप्त हुए हैं। तन्जौर का राजराजेश्वर मन्दिर द्रविड़ शैली का उत्तम उदाहरण है। पल्लवकालीन कई ऐसे मन्दिर मिले हैं जो वास्तु एवं स्थापत्य के उत्कृष्ट स्वरूप को प्रकट करते हैं।

इस प्रकार साहित्यिक स्रोत, विदेशी यात्रियों के विवरण तथा पुरातात्विक स्रोत के सम्मिलित साक्ष्य के आधार पर हम भारत के प्राचीन इतिहास का पुनर्निर्माण कर सकते हैं।

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    अनुक्रम

  1. प्रश्न- प्राचीन भारतीय इतिहास को समझने हेतु उपयोगी स्रोतों का वर्णन कीजिए।
  2. प्रश्न- प्राचीन भारत के इतिहास को जानने में विदेशी यात्रियों / लेखकों के विवरण की क्या भूमिका है? स्पष्ट कीजिए।
  3. प्रश्न- पुरातत्व के विषय में बताइए। पुरातत्व के अन्य उप-विषयों व उसके उद्देश्य व सिद्धान्तों से अवगत कराइये।
  4. प्रश्न- पुरातत्व विज्ञान की आवश्यकता पर प्रकाश डालिए।
  5. प्रश्न- प्राचीन भारतीय इतिहास के विषय में आप क्या जानते हैं?
  6. प्रश्न- भास की कृति "स्वप्नवासवदत्ता" पर एक लेख लिखिए।
  7. प्रश्न- 'फाह्यान पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए।
  8. प्रश्न- दारा प्रथम तथा उसके तीन महत्वपूर्ण अभिलेख के विषय में बताइए।
  9. प्रश्न- आपके विषय का पूरा नाम क्या है? आपके इस प्रश्नपत्र का क्या नाम है?
  10. प्रश्न- पुरातत्व विज्ञान के अध्ययन की आवश्यकता पर प्रकाश डालिए।
  11. प्रश्न- शिलालेख, पुरातन के अध्ययन में किस प्रकार सहायक होते हैं?
  12. प्रश्न- न्यूमिजमाटिक्स की उपयोगिता को बताइए।
  13. प्रश्न- पुरातत्व स्मारक के महत्वपूर्ण कार्यों पर प्रकाश डालिए
  14. प्रश्न- सिन्धु घाटी सभ्यता के विषय में आप क्या समझते हैं?
  15. प्रश्न- सिन्धु घाटी सभ्यता के सामाजिक व्यवस्था व आर्थिक जीवन का वर्णन कीजिए।
  16. प्रश्न- सिन्धु नदी घाटी के समाज के धार्मिक व्यवस्था की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
  17. प्रश्न- सिन्धु घाटी सभ्यता की राजनीतिक व्यवस्था एवं कला का विस्तार पूर्वक वर्णन कीजिए।
  18. प्रश्न- सिन्धु सभ्यता के नामकरण और उसके भौगोलिक विस्तार की विवेचना कीजिए।
  19. प्रश्न- सिन्धु सभ्यता की नगर योजना का विस्तृत वर्णन कीजिए।
  20. प्रश्न- हड़प्पा सभ्यता के नगरों के नगर- विन्यास पर विस्तृत टिप्पणी लिखिए।
  21. प्रश्न- हड़प्पा संस्कृति की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
  22. प्रश्न- सिन्धु घाटी के लोगों की शारीरिक विशेषताओं का संक्षिप्त मूल्यांकन कीजिए।
  23. प्रश्न- पाषाण प्रौद्योगिकी पर टिप्पणी लिखिए।
  24. प्रश्न- सिन्धु सभ्यता के सामाजिक संगठन पर टिप्पणी कीजिए।
  25. प्रश्न- सिंधु सभ्यता के कला और धर्म पर टिप्पणी कीजिए।
  26. प्रश्न- सिंधु सभ्यता के व्यापार का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
  27. प्रश्न- सिंधु सभ्यता की लिपि पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
  28. प्रश्न- सिन्धु सभ्यता में शिवोपासना पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  29. प्रश्न- सैन्धव धर्म में स्वस्तिक पूजा के विषय में बताइये।
  30. प्रश्न- ऋग्वैदिक अथवा पूर्व वैदिक काल की सभ्यता और संस्कृति के बारे में आप क्या जानते हैं?
  31. प्रश्न- विवाह संस्कार से सम्पादित कृतियों का वर्णन कीजिए तथा महत्व की व्याख्या कीजिए।
  32. प्रश्न- वैदिक काल के प्रमुख देवताओं का परिचय दीजिए।
  33. प्रश्न- ऋग्वेद में सोम देवता का महत्व बताइये।
  34. प्रश्न- वैदिक संस्कृति में इन्द्र के बारे में बताइये।
  35. प्रश्न- वेदों में संध्या एवं ऊषा के विषय में बताइये।
  36. प्रश्न- प्राचीन भारत में जल की पूजा के विषय में बताइये।
  37. प्रश्न- वरुण देवता का महत्व बताइए।
  38. प्रश्न- वैदिक काल में यज्ञ का महत्व बताइए।
  39. प्रश्न- पंच महायज्ञ' पर टिप्पणी लिखिए।
  40. प्रश्न- वैदिक देवता द्यौस और वरुण पर टिप्पणी लिखिए।
  41. प्रश्न- वैदिक यज्ञों की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
  42. प्रश्न- वैदिक देवता इन्द्र के विषय में लिखिए।
  43. प्रश्न- वैदिक यज्ञों के सम्पादन में अग्नि के महत्त्व को व्याख्यायित कीजिए।
  44. प्रश्न- उत्तरवैदिक कालीन धार्मिक विश्वासों एवं कृत्यों के विषय में आप क्या जानते हैं?
  45. प्रश्न- वैदिक काल में प्रकृति पूजा पर एक टिप्पणी लिखिए।
  46. प्रश्न- वैदिक संस्कृति की विशेषताएँ बताइये।
  47. प्रश्न- अश्वमेध पर एक टिप्पणी लिखिए।
  48. प्रश्न- आर्यों के आदिस्थान से सम्बन्धित विभिन्न मतों की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
  49. प्रश्न- ऋग्वैदिक काल में आर्यों के भौगोलिक ज्ञान का विवरण दीजिए।
  50. प्रश्न- आर्य कौन थे? उनके मूल निवास स्थान सम्बन्धी मतों की समीक्षा कीजिए।
  51. प्रश्न- वैदिक साहित्य से आपका क्या अभिप्राय है? इसके प्रमुख अंगों की विस्तृत व्याख्या कीजिए।
  52. प्रश्न- आर्य परम्पराओं एवं आर्यों के स्थानान्तरण को समझाइये।
  53. प्रश्न- वैदिक कालीन धार्मिक व्यवस्था पर प्रकाश डालिए।
  54. प्रश्न- ऋत की अवधारणा का विस्तृत वर्णन कीजिए।
  55. प्रश्न- वैदिक देवताओं पर एक विस्तृत टिप्पणी लिखिए।
  56. प्रश्न- ऋग्वैदिक धर्म और देवताओं के विषय में लिखिए।
  57. प्रश्न- 'वेदांग' से आप क्या समझते हैं? इसके महत्व की विवेचना कीजिए।
  58. प्रश्न- वैदिक कालीन समाज पर प्रकाश डालिए।
  59. प्रश्न- उत्तर वैदिककालीन समाज में हुए परिवर्तनों की व्याख्या कीजिए।
  60. प्रश्न- उत्तर वैदिक काल में शासन प्रबन्ध का वर्णन कीजिए।
  61. प्रश्न- उत्तर वैदिक काल के शासन प्रबन्ध की रूपरेखा पर प्रकाश डालिए।
  62. प्रश्न- वैदिक कालीन आर्थिक जीवन का विवरण दीजिए।
  63. प्रश्न- वैदिक कालीन व्यापार वाणिज्य पर एक निबंध लिखिए।
  64. प्रश्न- वैदिक कालीन लोगों के कृषि जीवन का विवरण दीजिए।
  65. प्रश्न- वैदिक कालीन कृषि व्यवस्था पर प्रकाश डालिए।
  66. प्रश्न- ऋग्वैदिक काल के पशुपालन पर टिप्पणी लिखिए।
  67. प्रश्न- वैदिक आर्यों के संगठित क्रियाकलापों की विवेचना कीजिए।
  68. प्रश्न- आर्य की अवधारणा बताइए।
  69. प्रश्न- आर्य कौन थे? वे कब और कहाँ से भारत आए?
  70. प्रश्न- भारतीय संस्कृति में वेदों का महत्त्व बताइए।
  71. प्रश्न- यजुर्वेद पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  72. प्रश्न- ऋग्वेद पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
  73. प्रश्न- वैदिक साहित्य में अरण्यकों के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
  74. प्रश्न- आर्य एवं डेन्यूब नदी पर टिप्पणी लिखिये।
  75. प्रश्न- क्या आर्य ध्रुवों के निवासी थे?
  76. प्रश्न- "आर्यों का मूल निवास स्थान मध्य एशिया था।" विवेचना कीजिए।
  77. प्रश्न- संहिता ग्रन्थ से आप क्या समझते हैं?
  78. प्रश्न- ऋग्वैदिक आर्यों के धार्मिक विश्वासों के बारे में आप क्या जानते हैं?
  79. प्रश्न- पणि से आपका क्या अभिप्राय है?
  80. प्रश्न- वैदिक कालीन कृषि पर टिप्पणी लिखिए।
  81. प्रश्न- ऋग्वैदिक कालीन उद्योग-धन्धों पर टिप्पणी लिखिए।
  82. प्रश्न- वैदिक काल में सिंचाई के साधनों एवं उपायों पर एक टिप्पणी लिखिए।
  83. प्रश्न- क्या वैदिक काल में समुद्री व्यापार होता था?
  84. प्रश्न- उत्तर वैदिक कालीन कृषि व्यवस्था पर टिप्पणी लिखिए।
  85. प्रश्न- उत्तर वैदिक काल में प्रचलित उद्योग-धन्धों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए?
  86. प्रश्न- शतमान पर एक टिप्पणी लिखिए।
  87. प्रश्न- ऋग्वैदिक कालीन व्यापार वाणिज्य की विवेचना कीजिए।
  88. प्रश्न- भारत में लोहे की प्राचीनता पर प्रकाश डालिए।
  89. प्रश्न- ऋग्वैदिक आर्थिक जीवन पर टिप्पणी लिखिए।
  90. प्रश्न- वैदिककाल में लोहे के उपयोग की विवेचना कीजिए।
  91. प्रश्न- नौकायन पर टिप्पणी लिखिए।
  92. प्रश्न- सिन्धु घाटी की सभ्यता के विशिष्ट तत्वों की विवेचना कीजिए।
  93. प्रश्न- सिन्धु घाटी के लोग कौन थे? उनकी सभ्यता का संस्थापन एवं विनाश कैसे.हुआ?
  94. प्रश्न- सिन्धु सभ्यता की आर्थिक एवं धार्मिक दशा का वर्णन कीजिए।
  95. प्रश्न- वैदिक काल की आर्यों की सभ्यता के बारे में आप क्या जानते हैं?
  96. प्रश्न- वैदिक व सैंधव सभ्यता की समानताओं और असमानताओं का विश्लेषण कीजिए।
  97. प्रश्न- वैदिक कालीन सभा और समिति के विषय में आप क्या जानते हैं?
  98. प्रश्न- वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति का वर्णन कीजिए।
  99. प्रश्न- सिन्धु सभ्यता के कालक्रम का निर्धारण कीजिए।
  100. प्रश्न- सिन्धु सभ्यता के विस्तार की विवेचना कीजिए।
  101. प्रश्न- सिन्धु सभ्यता का बाह्य जगत के साथ संपर्कों की समीक्षा कीजिए।
  102. प्रश्न- हड़प्पा से प्राप्त पुरातत्वों का वर्णन कीजिए।
  103. प्रश्न- हड़प्पा कालीन सभ्यता में मूर्तिकला के विकास का वर्णन कीजिए।
  104. प्रश्न- संस्कृति एवं सभ्यता में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
  105. प्रश्न- प्राग्हड़प्पा और हड़प्पा काल का विस्तृत वर्णन कीजिए।
  106. प्रश्न- प्राचीन काल के सामाजिक संगठन को किस प्रकार निर्धारित किया गया व क्यों?
  107. प्रश्न- जाति प्रथा की उत्पत्ति एवं विकास पर प्रकाश डालिए।
  108. प्रश्न- वर्णाश्रम धर्म से आप क्या समझते हैं? इसकी मुख्य विशेषताएं बताइये।
  109. प्रश्न- संस्कार शब्द से आप क्या समझते हैं? उसका अर्थ एवं परिभाषा लिखते हुए संस्कारों का विस्तार तथा उनकी संख्या लिखिए।
  110. प्रश्न- प्राचीन भारतीय समाज में संस्कारों के प्रयोजन पर अपने विचार संक्षेप में लिखिए।
  111. प्रश्न- प्राचीन भारत में विवाह के प्रकारों को बताइये।
  112. प्रश्न- प्राचीन भारतीय समाज में नारी की स्थिति पर प्रकाश डालिए।
  113. प्रश्न- वैष्णव धर्म के उद्गम के विषय में आप क्या जानते हैं? स्पष्ट कीजिए।
  114. प्रश्न- महाकाव्यकालीन स्त्रियों की दशा पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  115. प्रश्न- पुरातत्व अध्ययन के स्रोतों को बताइए।
  116. प्रश्न- पुरातत्व साक्ष्य के विभिन्न स्रोतों पर विस्तृत टिप्पणी लिखिए।
  117. प्रश्न- पुरातत्वविद् की विशेषताओं से अवगत कराइये।
  118. प्रश्न- पुरातत्व के विषय में बताइए। पुरातत्व के अन्य उप-विषयों व उसके उद्देश्य व सिद्धान्तों से अवगत कराइये।
  119. प्रश्न- पुरातत्व विज्ञान की आवश्यकता पर प्रकाश डालिए।
  120. प्रश्न- पुरातात्विक स्रोतों से प्राप्त जानकारी के लाभों से अवगत कराइये।
  121. प्रश्न- पुरातत्व को जानने व खोजने में प्राचीन पुस्तकों के योगदान को बताइए।
  122. प्रश्न- विदेशी (लेखक) यात्रियों के द्वारा प्राप्त पुरातत्व के स्रोतों का विवरण दीजिए।
  123. प्रश्न- पुरातत्व स्रोत में स्मारकों की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
  124. प्रश्न- पुरातत्व विज्ञान के अध्ययन की आवश्यकता पर प्रकाश डालिए।
  125. प्रश्न- शिलालेख, पुरातन के अध्ययन में किस प्रकार सहायक होते हैं?
  126. प्रश्न- न्यूमिजमाटिक्स की उपयोगिता को बताइए।
  127. प्रश्न- पुरातत्व स्मारक के महत्वपूर्ण कार्यों पर प्रकाश डालिए।
  128. प्रश्न- "सभ्यता का पालना" व "सभ्यता का उदय" से क्या तात्पर्य है?
  129. प्रश्न- विश्व में नदी घाटी सभ्यता के विकास पर प्रकाश डालिए।
  130. प्रश्न- चीनी सभ्यता के विकास पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  131. प्रश्न- जियाहू एवं उबैद काल पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  132. प्रश्न- अकाडिनी साम्राज्य व नॉर्ट चिको सभ्यता के विषय में बताइए।
  133. प्रश्न- मिस्र और नील नदी पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  134. प्रश्न- नदी घाटी सभ्यता के विकास को संक्षिप्त रूप से बताइए।
  135. प्रश्न- सभ्यता का प्रसार पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  136. प्रश्न- सिन्धु सभ्यता के विस्तार के विषय में बताइए।
  137. प्रश्न- मेसोपोटामिया की सभ्यता पर प्रकाश डालिए।
  138. प्रश्न- सुमेरिया की सभ्यता कहाँ विकसित हुई? इस सभ्यता की सामाजिक संरचना पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डालिए।
  139. प्रश्न- सुमेरियन सभ्यता के भारतवर्ष से सम्पर्क की चर्चा कीजिए।
  140. प्रश्न- सुमेरियन समाज के आर्थिक जीवन के विषय में बताइये। यहाँ की कृषि, उद्योग-धन्धे, व्यापार एवं वाणिज्य की प्रगति का उल्लेख कीजिए।
  141. प्रश्न- सुमेरियन सभ्यता में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  142. प्रश्न- सुमेरियन सभ्यता की लिपि का विकासात्मक परिचय दीजिए।
  143. प्रश्न- सुमेरियन सभ्यता की प्रमुख देनों का मूल्यांकन कीजिए।
  144. प्रश्न- प्राचीन सुमेरिया में राज्य की अर्थव्यवस्था पर किसका अधिकार था?
  145. प्रश्न- बेबीलोनिया की सभ्यता के विषय में आप क्या जानते हैं? इस सभ्यता की सामाजिक.विशिष्टताओं का उल्लेख कीजिए।
  146. प्रश्न- बेबीलोनिया के लोगों की आर्थिक स्थिति का मूल्यांकन कीजिए।
  147. प्रश्न- बेबिलोनियन विधि संहिता की मुख्य धाराओं पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
  148. प्रश्न- बेबीलोनिया की स्थापत्य कला पर प्रकाश डालिए।
  149. प्रश्न- बेबिलोनियन सभ्यता की प्रमुख देनों का मूल्यांकन कीजिए।
  150. प्रश्न- असीरियन कौन थे? असीरिया की सामाजिक व्यवस्था का उल्लेख करते हुए बताइये कि यह समाज कितने वर्गों में विभक्त था?
  151. प्रश्न- असीरिया की धार्मिक मान्यताओं को स्पष्ट कीजिए। असीरिया के लोगों ने कला एवं स्थापत्य के क्षेत्र में किस प्रकार प्रगति की? मूल्यांकन कीजिए।
  152. प्रश्न- प्रथम असीरियाई साम्राज्य की स्थापना कब और कैसे हुई?
  153. प्रश्न- "असीरिया की कला में धार्मिक कथावस्तु का अभाव है।' स्पष्ट कीजिए।
  154. प्रश्न- असीरियन सभ्यता के महत्व पर प्रकाश डालिए।
  155. प्रश्न- प्राचीन मिस्र की सभ्यता के विषय में आप क्या जानते हैं? मिस्र का इतिहास जानने के प्रमुख साधन बताइये।
  156. प्रश्न- प्राचीन मिस्र का समाज कितने वर्गों में विभक्त था? यहाँ की सामाजिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
  157. प्रश्न- मिस्र के निवासियों का आर्थिक जीवन किस प्रकार का था? विवेचना कीजिए।
  158. प्रश्न- मिस्रवासियों के धार्मिक जीवन का उल्लेख कीजिए।
  159. प्रश्न- मिस्र का समाज कितने भागों में विभक्त था? स्पष्ट कीजिए।
  160. प्रश्न- मिस्र की सभ्यता के पतन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  161. प्रश्न- चीन की सभ्यता के विषय में आप क्या जानते हैं? इस सभ्यता के इतिहास के प्रमुख साधनों का उल्लेख करते हुए प्रमुख राजवंशों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
  162. प्रश्न- प्राचीन चीन की सामाजिक व्यवस्था का उल्लेख कीजिए।
  163. प्रश्न- चीनी सभ्यता के भौगोलिक विस्तार का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
  164. प्रश्न- चीन के फाचिया सम्प्रदाय के विषय में बताइये।
  165. प्रश्न- चिन राजवंश की सांस्कृतिक उपलब्धियों का वर्णन कीजिए।

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