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बी एड - एम एड >> बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-B - मूल्य एवं शान्ति शिक्षा बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-B - मूल्य एवं शान्ति शिक्षासरल प्रश्नोत्तर समूह
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बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-B - मूल्य एवं शान्ति शिक्षा
प्रश्न- प्रथम विश्वयुद्ध में सैन्यवाद एवं साम्राज्यवाद कहाँ तक उत्तरदायी थे?
उत्तर-
प्रथम विश्वयुद्ध में सैन्यवाद- प्रथम विश्वयुद्ध के लिए सैन्यवाद भी काफ़ी जिम्मेदार था। वस्तुतः फ्रांस की क्रांति के साथ सैन्यवाद का जन्म हुआ एवं इटली, जर्मनी के एकीकरण के समय तक सैन्यवाद का काफ़ी विकास हुआ। धीरे-धीरे सेना के उच्चाधिकारियों पर हावी होने लगे एवं यह ज्ञात हुआ कि 1871 से विश्वविजय जैसे वादविवाद को अपने सेनानायकों की इच्छाओं के अनुसार, कूटनीतिज्ञ एवं लीडर में फ्रांस में प्रधान रहा। धीरे-धीरे सेना स्वतंत्र होकर राजनीतिकरण होता ही गया। किन्तु ये सेना के अधिकारी देश के अन्य मामलों में कम रुचि रखते थे एवं उनका केवल युद्ध में ही ध्यान था। वे युद्ध की योजना बनाते थे एवं सरकार के विचार एवं सम्मतियों को कम ही जानते थे। इस कूटनीतिक प्रवृत्तियों के युग में सैनिक शक्तियों को युद्ध की तैयारी बहुत ही पहले से कर लेते थे। यह सर्वविदित है कि जो आक्रमण करता है वह लाभ में रहता है लेकिन एक बार आक्रमण हो जाने पर युद्ध रोकना संभव नहीं होता है। सैनिक पदाधिकारियों युद्ध की समानता की ताक में सदैव रहते हैं, क्योंकि युद्ध के समय उनका महत्व बढ़ जाता है उन्हें सार्वजनिक दिखावे का मौका मिल जाता था तथा पदोन्नति की भी आशा होती थी। प्रथम विश्व युद्ध विशेषतः सैनिक पदाधिकारियों राजनीतिकों की जानकारी के बिना ही छेड़छाड़ कर युद्ध के लिए राजनेताओं पर हावी हो गया। साम्राज्यवादी विस्तार के लिए सेना तथा नौसेना बढ़ाने की होड़ लग गई। यह स्थिति युद्ध के लिए काफी हद तक उत्तरदायी था।
प्रथम विश्वयुद्ध में साम्राज्यवाद- साम्राज्यवाद का सबसे घातक परिणाम यह हुआ कि इसके कारण साम्राज्यों के बीच कट्टर प्रतिस्पर्धा चल पड़ी, जिससे उनके पारस्परिक राजनीतिक सम्बन्ध विकसित हो गए। 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में दौड़ते हुए बड़े राज्यों ने महासागरों, सारे संसार के आपस में बाँट लिया था, केवल कुछ हिस्सों का किसी को अधिकार नहीं था। व्यापार बड़े राज्य बनने के लिए आपस में प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ रही थी। सबसे जबरदस्त प्रतिस्पर्धा इंग्लैंड एवं जर्मनी के बीच थी। पिछड़े हुए क्षेत्रों में दोनों अपना-अपना व्यापार चलाना चाहते थे। इसी के कारण दोनों समाजों में अपने साम्राज्यवादी प्रभाव के विस्तार के लिए दोनों में संघर्ष हुआ तथा अन्त में पूरा यूरोप दो गुटों में बंट गया तथा प्रथम विश्वयुद्ध हुआ।
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