लोगों की राय

बी एड - एम एड >> बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण

बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :180
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2760
आईएसबीएन :0

Like this Hindi book 0

बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर

प्रश्न- पाठ नियोजन के विभिन्न उपागमों पर प्रकाश डालिये

उत्तर-

पाठ नियोजन के विभिन्न उपागम

वर्तमान समय में पाठ नियोजन के विभिन्न उपागम प्रचलन में हैं जिनका उपयोग शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं में शिक्षण अभ्यास में हो रहा है। इनका विवरण निम्नलिखित हैं-

1. हरबर्ट का पंचपदीय उपागम (Herbartian Five Steps Approach) - प्रशिक्षण संस्थाओं में गणित की पाठ योजना के निर्माण में अतीतकाल से हरबर्ट के शिक्षण पद प्रमुख आधार के रूप में प्रयुक्त होते आ रहे हैं। सर्वप्रथम जे. एफ. हरबर्ट (J. F. Herbart, 1776-1841 ) ने कक्षा शिक्षण हेतु पाठ्यवस्तु को प्रस्तुत करने की एक सामान्य शिक्षण विधि निर्धारित की थी, जिसमें चार पद थे-

(i) स्पष्टता (Clearness) - हरबर्ट का विचार था कि विषय-वस्तु या तथ्यों को बालक के समक्ष स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

(ii) सम्बन्ध (Association) - प्रस्तुत की जाने वाली विषय-वस्तु या तथ्यों का बालक के पूर्व ज्ञान से सम्बन्ध स्थापित किया जाना चाहिए।

(iii) व्यवस्था (System) - प्रस्तुत की जाने वाली विषय-वस्तु या तथ्यों को व्यवस्थित करके बालक के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

(iv) विधि (Method) - बालक द्वारा उपलब्ध ज्ञान को व्यावहारिक जीवन में उपयोग करने की विधि का ज्ञान कराना चाहिए।

हरबर्ट द्वारा प्रतिपादित उपर्युक्त पदों को और अधिक स्पष्ट करने एवं उपयोगी बनाने की दिशा में उनके शिष्यों ने विशेष कार्य किया। सर्वप्रथम उनके प्रमुख शिष्य टी. जिल्लर (Tusikon Ziller) ने प्रथम पद स्पष्टता को दो भागों में विभाजित करके प्रस्तुत किया- (i) प्रस्तावना (ii) प्रस्तुतीकरण। इसके पश्चात् हरबर्ट के एक अन्य शिष्य विल्हेम रीन (Wilhelm Rein) ने जिल्लर के उपर्युक्त दो पदों के मध्य एक नवीन पद 'उद्देश्य कथन' और जोड़ दिया। कालान्तर में हरबर्ट के अन्य अनुनायियों ने इन तीनों पदों के नाम में परिवर्तन करके नये रूप में प्रस्तुत किया, जो इस प्रकार हैं-

(i) सम्बन्ध तुलना (Comparison)
(ii) व्यवस्था - सामान्यीकरण (Generalisation)
(iii) विधि-प्रयोग (Application)

इस प्रकार हरबर्ट के पाँच पद निम्नलिखित रूप में जाने जाते हैं-

(i) (a) प्रस्तावना (b) उद्देश्य कथन
(ii) प्रस्तुतीकरण
(iii) तुलना
(iv) सामान्यीकरण 
(v) प्रयोग

हरबर्ट उपागम पर आधारित पाठ योजना के पद और उसका सामान्य प्रारूप

पाठ योजना संख्या

दिनाँक :..................    विषय :.................    कक्षा :.................
                                  उपविषय :.............    कालांश :.............
                                  प्रकरण :.................   अवधि :.................

सामान्य उद्देश्य : .............................................
विशिष्ट उद्देश्य : ..............................................
सहायक सामग्री : ............................................
पूर्व ज्ञान : ........................................................
प्रस्तावना : .....................................................
उद्देश्य कथन : .................................................
प्रस्तुतीकरण : .................................................
बोध प्रश्न : ........................................................
श्यामपट सारांश : ............................................
लेखन कार्य एवं निरीक्षण-: ...............................
पुनरावृत्ति प्रश्न : ............................................
गृहकार्य : ........................................................

2. ब्लूम का मूल्यांकन उपागम (Bloom's Evaluation Approach) - यह उपागम ब्लूम की टेक्सॉनोमी पर आधारित है। इसीलिए इसे ब्लूम उपागम अथवा मूल्यांकन उपागम कहा जाता है। शिक्षा के क्षेत्र में मूल्यांकन उपागम नवाचार है। इसने शिक्षण, अधिगम एवं परीक्षण प्रक्रिया में क्रान्ति ला दी है। इसमें पाठ योजना में शिक्षण लक्ष्यों को प्राथमिकता दी जाती है। शिक्षक समस्त शिक्षण क्रियायें शिक्षण लक्ष्यों की प्राप्ति पर केन्द्रित रहती हैं। शिक्षण लक्ष्यों की प्राप्ति से विद्यार्थियों में हुए व्यवहार परिवर्तन का मूल्यांकन किया जाता है। इसमें मूल्यांकन विद्यार्थियों की निष्पत्तियों (Attainments) तक ही सीमित नहीं होता है वरन् बालक के सम्पूर्ण व्यवहार, शिक्षण प्रक्रिया के उपकरणों, प्रविधियों एवं विधियों को भी सम्मिलित किया जाता है, जिससे यह जाँच की जा सके कि वे कहाँ तक शिक्षण लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायक हुए हैं? इस मूल्यांकन उपागम के तीन सोपान मुख्य हैं- 1. शिक्षण लक्ष्यों का निर्धारण

2. अधिगम - अनुभव प्रदान करना
3. व्यवहार परिवर्तन का मूल्यांकन करना।

ब्लूम के मूल्यांकन उपागम पर आधारित पाठ नियोजन का प्रारूप

पाठ योजना सं.

Table - 108

दिनाँक :..................   विषय :..................   चक्र :..................
                                 उपविषय :................
कक्षा :..................      प्रकरण :.................   समय :..................

अपेक्षित व्यावहारिक परिवर्तन

शिक्षण लक्ष्य
सहायक सामग्री
पूर्व ज्ञान
प्रस्तावना
उद्देश्य कथन
प्रस्तुतीकरण

शिक्षण बिन्दु शिक्षक क्रियाएँ छात्र क्रियाएँ शिक्षण विधि, प्रविधि
एवं शिक्षण सामग्री 
श्यामपट कार्य शिक्षण लक्ष्य



         


मूल्यांकन कार्य
गृहकार्य

3. डीवी एवं किलपैट्रिक का योजना उपागम (Dewey and Kilpatrick's Project Approach) - जॉन डीवी व्यवहारवाद (Pragmatism) के समर्थक थे। व्यवहारवाद का तात्पर्य कार्य अनुभव या कार्य की व्यावहारिकता या प्रयोजन से होता है। इसलिए जॉन डीवी ने अपने उपागम में स्वयं क्रिया तथा योजना पद्धति पर विशेष महत्व प्रदान किया। इसके अनुसार- विद्यार्थी स्वयं करके अनुभवों के द्वारा अधिक सीखता है।

डॉ. डब्ल्यू. एच. किलपैट्रिक जॉन डीवी के शिष्य थे। इन्होंने डीवी के शिक्षण सिद्धान्तों के आधार पर ही योजनाविधि (Project Method) का निर्माण किया।

किलपैट्रिक के अनुसार- “योजना इच्छा से किया जाने वाला वह उद्देश्यपूर्ण कार्य है जो सामाजिक वातावरण द्वारा सम्पन्न किया जाता है।"

योजना पद्धति में निम्नलिखित पदों का अनुसरण किया जाता है-

1. परिस्थिति उत्पन्न करना (Creating the situations)
2. योजना का चुनाव करना (Selection of the project)
3. रूपरेखा तैयार करना (Preparing outline)
4. कार्यक्रम को क्रियान्वित करना (Excution of programme)
5. कार्य का मूल्यांकन करना (Evaluation of the work )
6. कार्य का लिखित विवरण (Reporting )।

4. मॉरीसन उपागम (Morrison's Approach) - शिक्षण में इकाई का सम्प्रत्यय शिकागो * विश्वविद्यालय, केलीफोर्निया के प्रो. एच. सी. मॉरीसन (H. C. Morrison) 1926 की देन है। इसका उद्देश्य शिक्षण में पारंगति (Mastery) प्राप्त करना है। इसमें विषय-वस्तु को इकाइयों में बाँट लिया जाता है। प्रत्येक इकाई में विषय-वस्तु को एक विशिष्ट रूप से व्यवस्थित कर लिया जाता है, जिसमें सम्प्रत्ययों एवं विचारों में तारतम्य बना रहता है। इसमें सीखने वाला विद्यार्थी अवबोध प्राप्त करने में सहजता अनुभव करता है और सरलता से पठित विषय-वस्तु में पारंगत हो जाता है।

मॉरीसन ने विषय-वस्तु को इकाइयों में विभाजित करने में मनोवैज्ञानिक आधार अपनाया था। वर्तमान समय में प्रचलित इकाई का आधार विषय-वस्तु माना गया है और इकाई को उप इकाइयों (Sub-units) में विभाजित कर लिया जाता है। इस प्रकार इकाई किसी समस्या या प्रकरण के विभिन्नं अन्तर्सम्बन्धित रूपों को जानने के लिए विषय-वस्तु का सामान्य प्रारूप है। इकाई के अर्थ को स्पष्ट करते हुए मॉरीसन ने लिखा है

"इकाई वातावरण, संगठित विज्ञान, कला या आचरण का एक व्यापक एवं सार्थक पहलू है, जिसके सीखने का परिणाम व्यक्तित्व का अनुकूलन है। "

5. अमरीकन उपागम (American Approach) - यह उद्देश्य, व्यवहार तथा मूल्यांकन का प्रमुख उपागम है। इस उपागम में पाठ्यवस्तु के उद्देश्यों को निर्धारित एवं परिभाषित करके शिक्षण की अनेक विधियों, प्रविधियों तथा युक्तियों एवं श्रव्य दृश्य सामग्री के प्रयोग द्वारा ऐसी परिस्थितियों का निर्माण करने पर बल दिया जाता है कि कक्षा शिक्षण में सभी विद्यार्थी सक्रिय रूप से भाग लेते हुए-

(i) सीखने के अनुभव प्राप्त करते रहें,
(ii) उनके व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन होता रहे 
(iii) शिक्षण-अधिगम उद्देश्य की प्राप्ति हो जाये।

अमरीकन उपागम को आधुनिक रूप देने के लिए रोबर्ट, मैगर, मैसीआ, मिलर तथा करथवाल आदि अनेक शिक्षाशास्त्रियों ने अथक प्रयास किये, परन्तु इस क्षेत्र में प्रोफेसर ब्लूम (Prof. Bloom) का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। ब्लूम ने शिक्षण उद्देश्यों के ज्ञानात्मक, भावात्मक तथा क्रियात्मक पक्षों का वर्गीकरण करते हुए उन्हें व्यावहारिक रूप में लिखने पर बल दिया। साथ ही इस बात का मूल्यांकन करने के लिए विद्यार्थियों की क्रियाओं द्वारा शिक्षण-अधिगम उद्देश्य प्राप्त हुए अथवा नहीं, मानदण्ड परीक्षाओं का निर्माण करके उन्हें प्रयोग करने का सुझाव प्रस्तुत किया।

6. ब्रिटिश उपागम (British Approach) - अमरीकन उपागम की भाँति ब्रिटिश उपागम में भी पाठ्य-वस्तु तथा विद्यार्थी अपना महत्व रखते हैं, परन्तु रूढ़िवादी देश होने के कारण इंग्लैण्ड की शिक्षा अभी भी शिक्षक प्रधान है। इंग्लैण्ड में समस्त शिक्षण का केन्द्र-बिन्दु शिक्षक ही है। इंग्लैण्ड में जहाँ एक ओर शिक्षक की क्रियाओं को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। वहीं दूसरी ओर विद्यार्थियों के मूल्यांकन को भी महत्व दिया जाता है। ब्रिटिश उपागम में पाठ योजना बनाते समय शिक्षक की क्रियाओं तथा विद्यार्थियों के निष्पति परीक्षण द्वारा मूल्यांकन पर विशेष बल दिया जाता है।

7. आर. सी. ई. एम. उपागम (R. C. E. M. Approach) - पाठ नियोजन का यह उपागम रीजनल कॉलेज आफ एजूकेशन, मैसूर के डॉ. दवे द्वारा 1967 में विकसित किया गया। पूर्व उपागमों की तुलना में इसे अधिक व्यावहारिक माना गया क्योंकि इसमें शिक्षण अधिगम क्रिया में उद्दीपन तथा अनुक्रिया की अपेक्षा मानसिक क्रियाओं को अधिक महत्व दिया जाता है। इसमें लक्ष्यों के निर्धारण में ब्लूम की टेक्सोनॉमी को ही प्रयुक्त किया परन्तु ज्ञानात्मक पक्ष के छः वर्गों के स्थान पर चार- ज्ञान, बोध I, प्रयोग और सृजनात्मक को ही लिया गया। अन्तिम तीन वर्गों - विश्लेषण, संश्लेषण तथा मूल्यांकन को सृजनात्मक लक्ष्य में सम्मिलित किया गया। इस प्रकार इसमें ज्ञानात्मक पक्ष के चार भागों और 17 मानसिक योग्यताओं का विकास किया जाता है। यहीं भावात्मक एवं क्रियात्मक पक्ष के लिए भी उपयोगी हैं।

8. एन. सी. ई. आर. टी. उपागम (N. C. E.R.T. Approach) - प्रोफेसर एच. आर श्रीवास्तव और जे. पी. सूरी ने भी शिक्षण लक्ष्यों की टेक्सोनॉमी पर राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद, नई दिल्ली में कार्य किया। इन्होंने स्कूल विषयों के शैक्षिक लक्ष्यों में तीन शिक्षण लक्ष्यों में ज्ञानात्मक पक्ष के ज्ञान, बोध और अनुप्रयोग को ही अपनाया क्योंकि अनुप्रयोग में विश्लेषण, संश्लेषण और मूल्यांकन तीनों को ही समाहित मान लिया गया। इसके अतिरिक्त भावात्मक पक्ष को रुचि और अभिवृत्ति में तथा मनोशारीरिक पक्ष को कौशल में ही सीमित रखा गया। इस प्रकार वर्तमान समय में पाठ नियोजन में ज्ञान, बोध, अनुप्रयोग, कौशल, रुचि और अभिवृत्ति को लिखने पर बल दिया जा रहा है क्योंकि इनसे शिक्षण एवं मूल्यांकन की विधियों को सुनिश्चित करना सरल हो जाता है।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book