लोगों की राय

बी एड - एम एड >> बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण

बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :180
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2760
आईएसबीएन :0

Like this Hindi book 0

बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर

अध्याय 11- हिन्दी में श्रवण कौशल एवं पठन कौशल

प्रश्न- श्रवण कौशल का क्या अर्थ है? श्रवण कौशल का शिक्षण मे महत्व उद्देश्य बताते हुए श्रवण कौशल विकास की विधियों का वर्णन कीजिए।

उत्तर-

श्रवण कौशल

मनुष्य में भाषा सीखने की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहती है उसकी इस प्रवृत्ति का प्रमाण उसके शैशवावस्था में ही मिल जाता है। जब वह अनुकरण के माध्यम से अपने माता-पिता तथा घर के अन्य सदस्यों से ध्वनियां ग्रहण करता है; ध्वनि समूहों को समझने लगता है और उन्हें बोलने लगता है। यह स्वाभाविक प्रवृत्ति ही उसे भाषा सीखने की ओर प्रशस्त करती है। बालक द्वारा भाषा सीखने की प्रवृत्ति या विकास श्रवण कौशल पर निर्भर करता है।

भाषा एक कला है, दूसरी कलाओं की भांति इसे सीखा जाता है और सतत् अभ्यास से इसमें प्रवीणता आती है जिस प्रकार दूसरी कलाओं में साधनों की आवश्यकता होती है उसी प्रकार भाषा सीखने के लिए भी साधन की आवश्यकता होती है। इस साधन का दूसरा नाम अभ्यास है। शुद्ध एवं शिष्ट बोलने वाले व्यक्ति को स्कूल में पढ़े व्याकरण के नियम भले ही याद न हो, लेकिन बोलते समय स्वतः उसके मुख से व्याकरण सम्मत शुद्ध भाषा ही निकलेगी।

श्रवण कौशल शिक्षण का महत्व शिशु जन्म के उपरान्त सुनने लगता है। यह ध्वनियाँ उसके मन मस्तिष्क पर अंकित हो जाती है। यह अंकित ध्वनियाँ ही बच्चे के भाषा ज्ञान का आधार बनती है। अच्छी प्रकार से सुनने के कारण ही बालक ध्वनियों के सूक्ष्म अन्तर को समझ पाता है। श्रवण कौशल ही अन्य भाषाओं कौशलों को विकसित करने का मुख्य आधार बनता है श्रवण कौशल का महत्व निम्नवत है-

1. ध्वनियों के सूक्ष्म अन्तर को पहचानना
2. अध्ययन की आधार शिला
3. भाषा शिक्षण के उद्देश्य की प्राप्ति
4. वाचन कौशल का विकास
5. लेखन कौशल का विकास
6. व्यक्तित्व का विकास
7. विभिन्न साहित्यिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्राप्ति में सहायक

श्रवण कौशल शिक्षण के उद्देश्य श्रवण कौशल शिक्षण के प्रमुख उद्देश्य निम्नवत है-

1. सुनकर अर्थ ग्रहण करने की योग्यता का विकास करना।

2. किसी भी श्रुत सामग्री को मनोयोग पूर्वक सुनने की प्रेरणा प्रदान करना।

3. वक्ता के मनोभावों की निपुणता प्रदान करना।

4. श्रुत सामग्री के विषय को भलीभांति समझने की योग्यता उत्पन्न करना।

5. श्रुत सामग्री के विषय के महत्वपूर्ण एवं मर्मस्पर्शी विचारों, भावों एवं तथ्यों का चयन करने की क्षमता प्रदान करना।

6. विद्यार्थियों में ध्वनियों शब्दों का शुद्ध उच्चारण तथा स्वर गति, लय और प्रवाह के साथ पढ़ने की योग्यता विकसित करना।

7. छात्रों की मौलिकता मे वृद्धि करना।

8. छात्रों का मानसिक एवं बौद्धिक विकास करना।

9. छात्रों मे भाषा व साहित्य के प्रति रुचि पैदा करना।

10. छात्रों को साहित्यिक गतिविधियों में भाग लेने व सुनने के लिए प्रेरित करना।

11. श्रुत सामग्री का सारांश ग्रहण करने की योग्यता विकसित करना।

श्रवण कौशल विकास की विधियाँ - विद्यार्थियों में श्रवण कौशल के विकास हेतु शिक्षक को चाहिए कि वह बालकों की सुनने, बोलने की प्रक्रिया में सक्रिय रखे। क्योंकि श्रवण कौशल ही शुद्ध उच्चारण व शुद्ध लेखने की पृष्ठभूमि तैयार करता है। सस्वर वाचन स्वरोच्चारण श्रवण विधियों के द्वारा श्रवण कौशल का विकास किया जा सकता है। श्रवण कौशल के विकास हेतु निम्न विधियों का प्रयोग किया जा सकता है-

वार्तालाप विधि - विद्यार्थियों की मौखिक अभिव्यक्ति हेतु शिक्षक को चाहिए कि वह कक्षा में ऐसी व्यवस्था करे जिससे छात्र आपस में बातचीत के माध्यम से विचार-विमर्श कर सके जिससे उनकी झिझक तो मिटेगी ही साथ ही वे अपने विचारों को छोटे-छोटे वाक्यों में व्यक्त करना सीखेंगे।

वार्तालाप की विशेषतायें - एक अच्छे वार्तालाप में निम्नलिखित विशेषताएं होनी चाहिए ताकि वार्तालाप सार्थक रोधक बन सके

1. वार्तालाप मधुर हो।.
2. वार्तालाप में प्रभावोत्पादकता होनी चाहिए।
3. वार्तालाप की भाषा में गतिशीलता होनी चाहिए।
4. वार्तालाप मे यथोचित हाव-भाव हो।
5. वार्तालाप में बनावटीपन के स्थान पर स्वाभाविकता होनी चाहिए।
6. वार्तालाप का तरीका शिष्टाचार युक्त हो।
7. वार्तालाप का भाव स्पष्ट हो।
8. वार्तालाप में व्याकरण एवं उच्चारण सम्बन्धी शुद्धता होनी चाहिए।

(A) वार्तालाप के साधन - वार्तालाप के प्रमुख साधन निम्नलिखित हैं-

1. चित्रों का प्रयोग करके वार्तालाप कराई जा सकती है।

2. कहानी घटनावृतान्त अथवा यात्रा वर्णन सुनाकर उसकी पुनरावृत्ति कराई जा सकती है।

3. अभिनय अथवा नाटकीकरण द्वारा सीखने पर छात्रों का अर्जित ज्ञान लम्बे समय तक स्मरण में रहता है।

4. वाद-विवाद प्रतियोगिता के द्वारा भी वार्तालाप किया जा सकता है।

(B) वाक्य रचना विधि - वाक्य रचना विधि के द्वारा श्रवण कौशल का विकास करने मे सहायता प्राप्त की जा सकती है। किसी एक वाक्य को सुनने के बाद श्रोता के मनने मे दूसरा वाक्य सुनने की स्वाभाविक उत्कण्ठा उत्पन्न होती है। जिससे बालक मे श्रवण कौशल का विकास होता है। वाक्य की स्पष्टता ही उसकी सार्थकता होती है। इस हेतु सरल एवं व्यावहारिक शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए।

जो वाक्य स्रोता / बालक की सुषुप्त भावनाओं को जागृत करने में समर्थ हो वही सार्थक है।

वाक्य रचना के दोष श्रवण कौशल विकसित करने में बाधा उत्पन्न कर सकते है। अतः इससे बचना चाहिए।

(C) प्रश्नोत्तर विधि - भाषा कौशल, श्रवण कौशल, बोध ज्ञान जिज्ञासा की पूर्ति के लिए प्रश्नोत्तर विधि एक उत्तम उपाय है। प्रश्नोत्तर विधि महान दार्शनिक शिक्षा विधि सुकरात के देन मानी जाती है छोटे-छोटे प्रश्नों के माध्यम से बालक को अनेक जानकारियाँ मिलती हैं साथ ही उसे सोचने निर्णय करने का अवसर मिलता है। अधिक से अधिक प्रश्नों का प्रयोग करने से बालक में श्रवण कौशल एवं वाचन कौशल का विकास होता है।

(D) कहानी / घटना/यात्रा वर्णन विधि - यह जिज्ञासा वृद्धि करने वाली विधि होती है। इस विधि से बालक को किसी कहानी, घटना, यात्रा का वर्णन करके मौखिक रूप से सुनाया जाता है तथा बीच-बीच मे उनसे प्रश्न भी पूछे जाते है जिससे बालकों मे श्रवण कौशल का विकास करने में सहायता मिलती है।

(E) काव्य पाठ विधि - बालकों में लयबद्ध ध्वनियों को सुनने में विशेष रुचि होती है कविता या गीत एक लयबद्ध रचना होती है। इसे सुनकर कण्ठस्थ करना भी आसान होता है। इसमे भाषा की सहजता, लयबद्धता एवं सरलता होने के कारण बच्चे इन्हे खेल-खेल मे दोहराते रहते है। यही कारण है कि प्रार्थना व नीति वाक्य बच्चों को शीघ्र कण्ठस्थ हो जाते है। जैसे बचपन में सिखाया गया यह पद शकर- कार्बो, घी - वसा और दूध प्रोटीन हरी सब्जी में खनिज लवण और विटामिन मुझे आज तक कण्ठस्थ है।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book