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बी एड - एम एड >> बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षणसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर
प्रश्न- वाचन के शिक्षण की कौन-कौन सी विधियाँ हैं? बताइए।
उत्तर-
वाचन की शिक्षण विधियाँ
वाचन-शिक्षण में अनेक विधियों को प्रयुक्त किया जाता है। यहाँ वाचन की प्रमुख विधियों का उल्लेख किया गया है-
(1) अक्षर-बोध विधि - यह सबसे प्राचीन शिक्षण विधि है। इसमें सर्वप्रथम स्तर तथा व्यंजन शब्दों को पढ़ाया जाता है। इस विधि में अक्षर की ध्वनियों को प्रधानता दी जाती है। स्वर शिक्षा में बालक को शुद्ध उच्चारण का अभ्यास कराया जाता है। इसके बाद बालक स्वर एवं व्यंजन का मिलान सीखता है यही मिलान वाक्यों की रचना में सहायता करती है। बालक पूर्ण वाक्य की रचना करके वाचन करने लगता है, अक्षरों का मिलान सिखाया जाता है। इसके बाद शब्दों को मिलाकर वाक्य बनाया जाता है।
अक्षर-बोध विधि से बालकों का उच्चारण शुद्ध होता है। अक्षर शब्द तथा वाक्य का क्रमबद्ध ज्ञान होता है। अक्षरों में स्वरों व व्यंजनों को मिलाने से नये शब्दों की रचना होती है इस विधि से व्याकरण तथा भाषा सम्बन्धी नियमों का बोध भी सरलता से होता है।
(2) देखो और कहो विधि - इस विधि में अक्षरों के बोध के स्थान परं शब्द-बोध कराया जाता है। चित्र देखकर बालक को स्वयं ही उस शब्द का ध्यान आ जाता है। चित्र ऊपर अथवा नीचे बना रहता है। उसे देखो और कहो। बालक देखकर समझने का प्रयास करता है-फिर बोलता है। चित्र बालक के परिचय की परिधि में हो। बालकों के स्तर की वस्तुओं के चित्र तैयार किये जाते हैं उन्हीं को प्रयोग किया जाता है। चित्रों को श्याम पट्ट पर भी बनाया जा सकता है।
इस विधि की विशेषता इसकी रोचकता, मनोहरता, आकर्षण है। चित्र के साथ शब्दों का चित्र बालकों के मानसिक पटल पर छा जाता है। इन शब्दों और चित्रों के आधार पर वर्णमाला का ज्ञान भी दे 'दिया जाता है। इसमें क्रिया विपरीत होती है। शब्दों को सीखने के बाद उनके अक्षरों को सीखता है। इस विधि से प्रचलित शब्दों का वाचन सरलता से सीखे जाते हैं परन्तु क्रिया एवं भाव सम्बन्धी शब्दों के चित्र नहीं बनाये जा सकते हैं। यह विधि अंग्रेजी के वाचन शिक्षण के लिए अधिक उपयुक्त है।
(3) ध्वनि-साम्य विधि - इस विधि के अन्तर्गत ध्वनि की समानता रखने वाले शब्दों को साथ-साथ सिखाया जाता है। एक-सी ध्वनि के कारण छात्र एक साथ सरलता से सीख लेते हैं। जैसे- धर्म, कर्म, गर्म में समान ध्वनि होती है। इसी प्रकार श्रम, क्रम, भ्रम शब्दों में समान ध्वनि है। इस विधि में कभी-कभी अनावश्यक शब्द भी सीखने पड़ जाते हैं जिन्हें हम प्रयोग में नहीं लाते हैं तथा कुछ अशुद्ध भी होते हैं। इस विधि का प्रयोग सीमित शब्दों के उच्चारण सीखने में ही किया जाता है।
(4) कहानी विधि - कहानी विधि में बालक अधिक रुचि लेते हैं। कहानी को चार-पाँच वाक्यों में पूर्ण करके सुनानी चाहिए। चित्रों की सहायता से कहानी विधि अधिक प्रभावशाली होती है। चित्रों को देखकर वाक्यों को पढ़कर कहानी का पूर्ण ज्ञान रोचकता से हो जाता है। भाषा प्रवाह कहानी से ही विकसित होता है। कहानी विधि में छात्र अनुकरण से सीखते हैं। कहानी कहते समय भाषा की शुद्धता तथा भाव पक्ष को भी ध्यान में रखना चाहिए। कहानी विधि से वाचन सीखते हैं।
(5) अनुकरण विधि - बालक अनुकरण विधि से ही अधिक सीखते हैं। परन्तु हिन्दी में अंग्रेजी की अपेक्षा कम उपयोग है। हिन्दी में प्रत्येक अक्षर की ध्वनि निश्चित है जबकि अंग्रेजी अक्षर की ध्वनि निश्चित नहीं होती है। एक ही अक्षर डी का प्रयोग 'द' तथा 'ड' दोनों ध्वनियों के लिए होता है। शिक्षक के आदर्श वाचन का अनुकरण जीवन पर्यन्त छात्रों के काम आता है। शिक्षक के उच्चारण के अनुकरण से ही बालक शुद्ध उच्चारण सीखते हैं जिससे वाचन में शुद्धता आती है और भावपूर्ण वाचन सीखता है। अनुकरण विधि के लिए शिक्षक के वाचन में भावपूर्ण और शुद्ध उच्चारण आज आवश्यक होता है।
(6) वाक्य - शिक्षण विधि - अक्षर बोध विधि में अक्षर की ध्वनि से देखो और कहो की विधि में शब्दों से शिक्षण आरम्भ करते हैं। वाक्य विधि में शब्दों से प्रारम्भ न होकर वाक्यों से शिक्षण आरम्भ किया जाता है। इस विधि में शिक्षण क्रम अवरोही होता है वाक्य से शब्द से अक्षर का बोध कराया जाता है।
अक्षर बोध विधि में आरोही क्रम अक्षर से शब्द से लिखने तथा पढ़ने के पूर्व ही बालक पूर्ण वाक्य बोलता है और सुनता है। इसीलिए शिक्षण वाक्य से करना मनोवैज्ञानिक प्रतीत होता है। आरम्भ में वाक्यों का स्वरूप दो शब्दों का, फिर तीन शब्दों का होना चाहिए।
आरम्भिक स्तर पर - 'पानी लाओ', 'खाना दो', 'स्कूल जाओ'।
द्वितीय स्तर पर - ' मैंने पानी पिया', 'वह खाना लाया', 'मेरा घर है। '
तृतीय स्तर पर - मैंने पानी नहीं पिया', 'वह अपने घर गया।'
इस प्रकार वाक्यों का आकार धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए।
(7) भाषा शिक्षण की तकनीकी विधि - आज शिक्षण के क्षेत्र में 'शिक्षा-तकनीकी' का विकास हुआ है। इसके परिणामस्वरूप शिक्षण में मशीनों तथा यन्त्रों का प्रयोग किया जाने लगा है। भाषा प्रयोगशाला का भी विकास हुआ है। इस प्रयोगशाला में वाचनं तथा शब्दों के शुद्ध उच्चारण का विकास किया जाता है। इसके अतिरिक्त दूरदर्शन, रेडियो, ग्रामोफोन, टेप रिकॉडर आदि के द्वारा भी वाचन तथा भाषा सीखते हैं। भाषा शिक्षण के लिए आडियो टेप तथा विडियो टेप का निर्माण किया गया है।
बालक संगीतों को सुनकर तथा चित्रहार का स्वाभाविक रूप में संस्मरण कर लेते हैं। दूरदर्शन पर शिक्षण सम्बन्धी कार्यक्रम आने लगे हैं प्रातः काल विश्वविद्यालय अनुदान आयोग तथा 'इन्दिरा गाँधी' राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के शिक्षण कार्यक्रम आते हैं जिसे 'दरवर्ती शिक्षा' कहते हैं। इस विधि के प्रयोग में आपत्ति करते हैं कि भारत जैसे गरीब देश में इस विधि का उपयोग सम्भव नहीं है परन्तु यह धारणा मिथ्या है क्योंकि कम्प्यूटर का उपयोग अधिक होने लगा है। कम्प्यूटर सहायक अनुदेशन का प्रयोग भाषा - शिक्षण में किया जा सकता है।
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