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बी एड - एम एड >> बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षणसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर
प्रश्न- श्रुतलेख क्या है? एक शिक्षक को श्रुतलेख में क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिए? एवं अशुद्धियों अशुद्धियों में सुधार कैसे करना चाहिये?
उत्तर-
श्रुतलेख / इमला
जब धान अनुलेखन व प्रतिलेखन की कला में दक्ष हो जाने के बाद इतने समर्थ हो जाते है। कि वे शब्दों तथा वाक्यों को सुनकर उनके उच्चारण के आधार पर स्वयं ही उन्हें शुद्ध रूप में लिखने लग जाते हैं तब इस प्रकार लिखे गये की श्रुत लेख कहते हैं। इस प्रकार श्रुतलेख के अन्तर्गत शिक्षक किसी पाठ्य पुस्तक समाचार पत्र तथा पत्रिकाओं आदि के किसी अंश को छात्रों के सम्मुख बोलते है। और छात्र उनका वाचन सुनकर अपनी कॉपियों पर उससे लिखते जाते है। श्रुतलेख का अर्थ ही है। सुनकर किया गया लेखन। अतः इस प्रकार के लेखन में शिक्षक बोलते है और छात्र श्रवण का तदनुरूप लेखन करते है। इसमें भी सुलेख का लक्ष्य लेकर छात्रों की अनुलेखन और प्रति लेखन से प्राप्त योग्यताओं का उच्चीकरण किया जाता है और उन्हें बिना देखे लिखने का अभ्यास कराया जाता है। 'जैस्पर्शन' ने श्रुतलेख की परिभाषा निम्न रूप में दी है श्रुतलेख बोले गये शब्दों या पदों के शीघ्र समझने का प्रशिक्षण देता हैं और इसके माध्यम से शिक्षक छात्रों बोधगम्यता का अनुमान भी कर सकते हैं। सामान्यतः छात्र अपने लिखे हुए शब्द तथा पद भली प्रकार स्मरण रखते है।"
श्रुतलेख की सावधानियाँ
श्रुतलेख का अभ्यास छात्रों को कक्षा 2 से ही प्रारम्भ कराया जा सकता है। इसमें कुछ व्यवहारिक कठिनाईयाँ आती है। जिन्हें योग्य शिक्षक अपनी तत्परता तथा बुद्धि कौशल से कुछ सावधानियाँ ध्यान में रख कर सरलता से दूर कर सकते हैं-
1. पहली कठिनाई बोलने में शीघ्रता को लेकर आती है। कुछ शिक्षक बोलते समय छात्रों की लेखन गति की क्षमता का ध्यान नहीं रख पाते हैं और जल्दी-जल्दी बोलने लगते है। ऐसे में कुछ मेधावी छात्र तो येन-केन प्रकारेण लिख लेते हैं, किन्तु औसत तथा कमजोर छात्र पिछड़ जाते है। अतः शिक्षक को बोलते समय अपनी गति पर नियन्त्रण रखते हुए छात्रों की क्षमताओं के अनुरूप वाचन करना चाहिए।
2. कभी-कभी शिक्षक पढ कर या बिना पढ़े बोल देता है, किन्तु कुछ छात्र शब्दों की शुद्ध वर्तनी का ज्ञान न होने अथवा भूल जाने के कारण गलत लिख देते है। इसके निवारण के लिए पहले तो छात्रों की वर्तनी की समुचित शिक्षा देनी चाहिये और उसके बाद भी जो अशुद्धियां होती है। उनकी सम्यक जाँच करके संशोधन किया जाना चाहिये। थोड़े धैर्य और छात्रों के प्रति सहानुभूति से व्यवहार करके यह कठिनाई सरलता से दूर की जा सकती है।
3. श्रुतलेख में छात्र शीघ्र लिखने के चक्कर में घसीटा मार लिखावट करने लग जाते है। धीरे-धीरे वे खराब लिखने के अभ्यस्त हो जाते है और अपना सुलेख चौपट कर लेते है। इस कठिनाई का इलाज करने के लिए विशेष प्रयासो की आवश्यकता होती है। ऐसे छात्रों को इमला करने के लिए विशेष प्रयासों की आवश्यकता होती है। ऐसे छात्रों की इमला बोलते समय शिक्षक को शीघ्रता नहीं करनी चाहिए। छात्रों को वर्तनी की समुचित शिक्षा देनी चाहिए और उनके बैठने, कलम पकड़ने और कागज की मानक दूरी आदि का भी पूरा ध्यान रखना चाहिए। छात्रों को उनकी सुलेख प्रियता तथा उनके अच्छे लेख के लिए पुरस्कृत करते हुये उन्हें प्रोत्साहन भी देना चाहिए।
4. श्रुतलेख बोलते समय प्रायः ऐसा देखा गया है कि अनुस्वार, विसर्ग रेफ का स्थान, प्रश्नवाचक चिन्ह, अर्धविराम, अल्पविराम, डैस, हाइफन आदि लगाने में उच्च कक्षाओं तक के छात्र या तो अनभिज्ञ होते है। अथवा इनमें गलतियाँ करते है। अतः हिन्दी शिक्षक को अपने छात्रो को विराम चिन्हों का सम्यक शिक्षण करना चाहिए तथा इसका सही प्रयोग करने वालो को समुचित प्रशंसा तथा पुरस्कार आदि से दूर न किया गया तो जीवन भर यह अनेक साथ रहता है। अतः इस क्षेत्र में विशेष ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है।
श्रुतलेख की अशुद्धियों में सुधार
श्रुत लेख की सफलता के लिए जितना परिश्रम छात्र को करना चाहिए उतना ही श्रम साध्य शिक्षक का भी दायित्व है। अतः शिक्षक को भाषा का पूर्ण ज्ञात तथा छात्रों की कठिनाइयों को समझकर मनोवैज्ञानिक विधियों से उन्हें दूर करने वाला होना चाहिए। इसके लिए शिक्षक को स्वयं शुद्ध उच्चारण, उपयुक्त ठहराव, व गति का पालन तथा छात्रों की रुचियों के योग्यताओं व क्षमताओं के अनुसार- अपनी प्रभावी शिक्षण योजना बनाना अदि में कुशल होना बहुत आवश्यक है।
श्रुतलेख सुलेख का प्रशिक्षण देने की सर्वोत्तम विधि है। इससे छात्र की श्रवण इन्द्रियों का विकास होता है तथा उनमें एकाग्रता तथा आत्म विश्वास की वृद्धि होती है। इसके द्वारा केवल कान ही नहीं बल्कि हाथ पैर पीठ, मुख वाणी, चिन्तन, समझ आदि समस्त क्रियाओं में एक समन्वय स्थापित होता है। उनमें सुनकर समझने तथा अपेक्षित आनन्द उठाने की क्षमता में वृद्धि होती है। ये सब आगे चलकर उनके एक अच्छा लेखक बनने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
श्रुतलेख में प्रायः जो अशुद्धियाँ होती है उनका प्रमुख कारण उच्चारण कौशल या श्रवण कौशल में दोष का होना पाया जाता है। अतः इसे निम्नांकित प्रयासों के द्वारा दूर किया जा सकता है-
1. उच्चारण की स्पष्टता पर ध्यान देना
2. ध्वनियों के सूक्ष्म अन्तर को पहचानना।
3. वाचन एवं लेखन कौशल का विकास करना।
4. वाचित या श्रवण की गई विषय वस्तु को लिखे जाने तक स्मृति में रखना।
5. विद्यार्थीयों में ध्वनियों शब्दों का शुद्ध उच्चारण तथा स्वर गति, लय और प्रवाह के साथ पढ़ने व सुनने की योग्यता विकसित करना।
6. श्रुत सामग्री का साटांय ग्रहण करने की योग्यता को विकसित करना।
7. उच्चारण के उद्गम स्थलों का अभ्यास कराना।
8. श्रवण कौशल का विकास करना क्योंकि श्रवण कौशल ही शुद्ध उच्चारण व शुद्ध लेखनकी पृष्ठभूमि तैयार करता है।
9. श्रुत सामग्री के विषय को भली भाँति समझने की योग्यता विकसित करना।
10. वाचनकर्ता के स्वर में स्पष्टता ध्वनि व गति की तीव्रता का ध्यान रखना।
11. शुद्ध ध्वनियों व शुद्ध उच्चारण का अभ्यास करना।
12. स्वाध्याय की आदत का विकास करना।
13. स्वतः अर्थ ग्रहण करने की क्षमता का विकास करना।
14. उच्चारण दोष जैसे हकलाना, तुतलाना व श्रवण दोष जैसे श्रवण बाधिता या कम सुनाई देना जैसी बीमारी का यथोचित उपघर कराना।
15. बालक के आत्मविश्वास में वृद्धि करना।
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