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बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :180
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2760
आईएसबीएन :0

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बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर

प्रश्न- लेखन-शिक्षण की कौन-कौन सी विधियाँ हैं? उनका वर्णन कीजिये।

उत्तर-

वाचन और लेखन भाषा के दो रूप हैं। यही भाषा के प्रमुख कौशल हैं। भाव व विचार अभिव्यक्ति का माध्यम वाचन तथा लेखन है। वाचन की क्रिया स्वाभाविक है तथा वाचन की प्रकृति प्रदत्त शक्ति है। बालक सुनकर, अनुकरण तथा अभ्यास द्वारा मातृभाषा बोलना सीख लेता है और बालक अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति करने लगता है। प्रशिक्षण तथा शिक्षा द्वारा वाचन में कुशलता एवं प्रवाह का विकास किया जाता है। वाचन में ध्वनियों को प्रधानता दी जाती है।

लेखन-शिक्षण की विधियाँ

लेखन एक महत्त्वपूर्ण कला है। इसके प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। इसके लिए अनेक विधियों या प्रविधियों का अनुसरण किया जाता है। अक्षर ज्ञान से वाक्यों की रचना, भाषा-शैली, अभिव्यक्ति के रूपों तथा विभिन्न विधियों की आवश्यकता होती है। यहाँ कुछ प्रमुख लेखन शिक्षण की विधियों का विवरण दिया गया है-

(1) अक्षर के रूप की अनुकरण विधि - लेखन में अक्षर एवं शब्दों के स्वरूप को विशेष महत्त्व दिया जाता है। अक्षरों का आकार सुन्दर तथा सुडौल हो, इस बात का विशेष ध्यान दिया जाता है। इस विधि के अन्तर्गत शिक्षक श्याम पट्ट या स्लेट, कापी पर अक्षरों के लिए बिन्दु रखते हैं। छात्रों को इन बिन्दुओं को मिलाने का अभ्यास कराया जाता है जिससे छात्र अक्षर बना लेता है। इसी प्रकार वाक्यों तथा शब्दों को आदर्श रूप में शिक्षक लिखता है या इस प्रकार कार्य पुस्तकों का उपयोग करके अनुकरण कराते हैं, शिक्षक उनमें सुधार करता है और पुनः अभ्यास करता है। इस प्रकार के अभ्यास से अक्षरों, शब्दों तथा वाक्यों को लिखना सीख लेते हैं। यदि अर्थ के साथ सिखाया जाये तब अधिक रुचि लेते हैं। 

(2) स्वतन्त्र अनुसरण विधि - जब छात्र अक्षरों तथा वाक्यों को लिखना सीख लेते हैं तत्पश्चात् यह विधि अधिक उपयोगी होती है। इस विधि में छात्रों को दिये गये गद्यांश को स्वतन्त्र रूप से अनुकरण कराया जाता है। श्रुत-लेखन विधि का अधिक प्रचलन है। इसका उद्देश्य है- अक्षरों तथा वाक्यों को सुन्दर व सुडौल रूप में लिखना तथा शब्दों को शुद्ध रूप में लिखना भी सीखें, इसमें शब्दों की वर्तनी को भी महत्त्व दिया जाये। लेखन में शब्दों की शुद्ध वर्तनी का विशेष महत्त्व है जबकि वाचन में शुद्ध उच्चारण का। प्रथम अवस्था में शब्दों को देखकर उनका शुद्ध रूप में अनुकरण करके लिखना सीखें तत्पश्चात् श्रुतलेखन में सुनकर बिना देखे ही लिखने का अभ्यास करना सीखे। अशुद्ध शब्दों को बार-बार शिक्षक लिखवाता है, जिससे शुद्ध लिखना सीख सके।

(3) मॉण्टेसरी-शिक्षण विधि - यह मनोवैज्ञानिक शिक्षण की विधि है। इसके अन्तर्गत सिखाते समय हाथ, आँख तथा कान तीनों की सक्रियता पर बल दिया जाता है। सबसे पहले प्लास्टिक या लकड़ी के बने अक्षरों को देखते हैं और उन्हें छात्र से भी स्पर्श कराते हैं। इन्हीं अक्षरों पर पेंसिल को घुमाया जाता है। रंगीन पेंसिल का प्रयोग उत्तम रहता है। इस प्रकार के बालकों के स्वरूप को आँख तथा हाथ से अवगत कराया जाता है। तत्पश्चात् प्रथम विधि के अनुसार-, अक्षरों के रूप का अनुसरण कराया जाता है और अक्षरों को बार-बार लिखने का अभ्यास कराया जाता है। दो अक्षरों के शब्दों को लिखना सिखाते हैं और शब्दों की कठिनाई धीरे-धीरे बढ़ जाती है। शब्दों और वाक्यों को लिखना सिखाया जाता है। यह विधि अधिक प्रचलित है।

(4) जेकॉटॉट शिक्षण विधि - इस विधि में छात्र अपने लेखन का स्वयं सुधार करता है। बालकों द्वारा पढ़े हुए वाक्यों को छात्रों को लिखने को देता है। छात्र एक-एक शब्द लिखकर शिक्षक द्वारा लिखित शब्दों से मिलान करके अशुद्धियों को दूर करता है। जब वाक्य लिखने लगते हैं तब पुनः वाक्य से मिलान कर लेते हैं। मूल वाक्य को बिना देखे हुए छात्रों को लिखने को कहता है। छात्र उसका स्मरण करके लिखने का प्रयास करते हैं। अशुद्ध शब्दों को पुनः शुद्ध रूप में लिखने का अभ्यास करते हैं।

(5) मनोवैज्ञानिक विधि - इस विधि के अन्तर्गत बालकों को सर्वप्रथम वर्णमाला के अक्षर तथा शब्द आदि सिखाने की अपेक्षा पूर्ण वाक्य को बोलना तथा उनका लिखना सिखाया जाये। इस विषय में  एक विद्वान का कथन है कि "सर्वप्रथम हमें बच्चों को बोलना सिखाना चाहिए। इन पूर्ण वाक्यों के लिए किसी चिन्ह विशेष सिखाने की आवश्यकता नहीं। भाव चित्र उनके मस्तिष्क में बन जायें इतना ही पर्याप्त होता है। जब बच्चे मौखिक रूप से पूर्ण वाक्य बोलने लगें और उनकी कर्मेन्द्रियाँ दृढ़ हो जायें तो उन्हें पढ़ने व लिखने के लिए तैयार करना चाहिए।" एक अन्य विद्वान के शब्दों में "बालक जब पाठशाला में प्रवेश करने जाता है तो वह छोटे-छोटे वाक्यों को बोलना जानता है। वर्णमाला के भिन्न-भिन्न अक्षर उसके लिए निरर्थक तथा सारहीन होते हैं, उनका अपने में कोई अर्थ नहीं होता। आपस में मिलकर जब वे शब्दों अथवा वाक्यों के रूप में आते हैं तब वे सार्थक बनते हैं। शिक्षाशास्त्रियों ने इस विषय में जो प्रयोग किये उनके आधार पर बालकों को पहले सार्थक शब्द अथवा वाक्य ही सिखाये जायें। "

(6) पेस्टालॉजी विधि - इस विधि का प्रमुख आधार सरल से कठिन की ओर चलना है। अक्षर ज्ञान इसमें पहले कराया जाता है। अक्षरों की आकृति को विभिन्न टुकड़ों में विभाजित कर लिया जाता है तत्पश्चात् टुकड़ों के योग से उस अक्षर की रचना कराई जाती है। पहले उन वर्णों को सिखाया जाता है, जो सरल होते हैं।

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