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बी एड - एम एड >> बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षणसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर
अध्याय 13 - भाषा शिक्षण में दृश्य-श्रव्य साधनों की भूमिका
प्रश्न- दृश्य-सामग्री से आप क्या समझते हैं? उनके शिक्षण में उपयोग का वर्णन कीजिए।
सम्बन्धित लघु उत्तरीय प्रश्न
1. दृश्य सामग्री का अर्थ बताइये तथा समुचित दृश्य-सामग्री का चयन कीजिये।
उत्तर-
दृश्य-सहायक सामग्री का अर्थ
दृश्य सामग्री का तात्पर्य उन साधनों से है, जिनमें केवल दृश्य इन्द्रियों का प्रयोग होता है अर्थात् जिनमें ज्ञान मुख्यत- दृश्य इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त होता है।
निम्नांकित पंक्तियों में हम प्रमुख दृश्य साधनों पर प्रकाश डाल रहे हैं-
(1) वास्तविक पदार्थ (Real Object) - वास्तविक पदार्थों का तात्पर्य मूल वस्तुओं से है।' वास्तविक पदार्थ बालकों की इन्द्रियों को प्रेरणा देते हैं तथा उन्हें निरीक्षण एवं परीक्षण के अवसर प्रदान करके उनकी अवलोकन शक्ति का विकास करते हैं। ध्यान देने की बात है कि जब बालक वास्तविक पदार्थों को देखते हैं, छूते अथवा चखते हैं तो उनकी क्रमशः दृष्टि स्पर्शावण तथा रस प्रतिभायें निर्मित होती हैं। ये प्रतिभायें बालकों की कल्पना शक्ति को विकसित करने में सहयोग प्रदान करती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि वास्तविक पदार्थों के प्रयोग से बालकों को नाना प्रकार के अनुभव प्राप्त होते हैं जो दूसरों के द्वारा दिये गये अनुभवों की अपेक्षा कहीं अधिक उत्तम होते हैं। स्पष्ट हैं कि बालकों को मेज, कुर्सी, रोटी, कपड़ा, फल, फूल तथा थर्मामीटर एवं भौतिक तुला आदि का ज्ञान देने के लिये जितना स्पष्ट ज्ञान उक्त सभी वास्तविक पदार्थों को दिखाकर दिया जा सकता है उतना किसी और विधि से असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है।
(2) प्रतिमान (Models) - प्रतिमान वास्तविक पदार्थों अथवा मूल वस्तुओं के छोटे रूप होते हैं। इनका प्रयोग उस समय किया जाता है जब वास्तविक पदार्थ या तो उपलब्ध न हों अथवा इतने बड़े हों कि उन्हें कक्षा में दिखाना सम्भव न हो। उदाहरण के लिये हाथी, घोड़े, रेल का इन्जन तथा जहाज आदि इतने बड़े होते हैं कि उन्हें कक्षा में उपस्थित नहीं किया जा सकता। अतः बालकों को उक्त सभी का ज्ञान देने के लिये उनके नमूने दिखाये जाते हैं। स्मरण रहे कि नमूने बड़े हों अथवा छोटे, वास्तविक पदार्थों से मिलते-जुलते होने चाहिए। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि नमूने वास्तविक पदार्थों से भी अच्छे लगते हैं। इसका कारण यह है कि इन्हें ठीक प्रकार से देखा जा सकता है। ध्यान देने की बात है कि यदि नमूनों में वास्तविक पदार्थों के विविध रूप स्पष्ट रूप से दिखाई देंगे तो वे बालकों की कल्पना शक्ति विकसित करते हुये शिक्षक को उद्देश्य प्राप्त करने में सहायता कर सकते हैं अन्यथा नहीं।
(3) अचल चित्र (Still Pictures) - चित्रों का प्रयोग उस समय किया जाता है जब न तो वास्तविक पदार्थ ही उपलब्ध हो और न ही नमूने मिल सके। दूसरे शब्दों में, जब वास्तविक पदार्थों तथा नमूनों का मिलना कठिन हो जाता है तो ऐसी स्थिति में चित्रों का प्रयोग किया जाता है स्मरण रहे कि चित्रों से वास्तविक पदार्थों के स्पर्श के सम्बन्ध में कोई ज्ञान प्राप्त नहीं होता फिर भी इनका शिक्षण में विशेष लाभ होता है। वैसे भी चित्र प्राय- पदार्थों तथा नमूनों से सस्ते होते हैं एवं बाजार में आसानी से मिल भी जाते हैं। ध्यान देने की बात है कि जब शिक्षक ज्ञान का वितरण करते समय चित्रों की सहायता लेता है तो बालकों का ध्यान पाठ की ओर लगा रहता है। इससे शिक्षक अपने उद्देश्य को सरलतापूर्वक प्राप्त कर लेता है। अतः शिक्षक को छोटी कक्षाओं में तो चित्रों का प्रयोग अवश्य करना चाहिए। स्मरण रहे कि यूँ तो चित्रों का प्रयोग प्रायः सभी स्तरों पर करना चाहिए पर विशेष रूप से भूगोल, इतिहास, विज्ञान, भाषा तथा बागवानी एवं प्रकृति निरीक्षण आदि विषयों के शिक्षण में अवश्य करना चाहिए।
(4) मानचित्र (Maps ) - मानचित्र का प्रयोग प्रमुख ऐतिहासिक घटनाओं तथा भौगोलिक तथ्यों अथवा स्थानों के अध्ययन करने के लिये परम आवश्यक है। यूँ तो मानचित्र बाजार में बने बनाये मिल जाते हैं पर अच्छा यही है कि शिक्षक मानचित्रों को स्वयं ही बनाये और उनमें केवल उन्हीं बातों को सुन्दर ढंग से अंकित करें जिनकी नितान्त आवश्यकता हो। स्मरण रहे कि शिक्षक को मानचित्र के ऊपर उनका नाम, शीर्षक, दिशा तथा संकेत आदि अवश्य लिखने चाहिए तथा उनमें रंगों का प्रयोग कल्पना, अनुभव तथा कलात्मक भाव से करना चाहिए अन्यथा मानचित्र भद्दे, भौंड़ें तथा व्यर्थ हो जायेंगे।
(5) रेखाचित्र तथा आकृतियाँ (Sketches and Diagrams) - कभी-कभी ऐसा भी होता है कि शिक्षक को वास्तविक पदार्थ, नमूने तथा चित्र एवं मानचित्र उपलब्ध नहीं हो पाते। ऐसी स्थिति में शिक्षक को भाव- प्रकाशन के लिये श्याम-पट्ट पर रंगीन चौक से रेखाचित्र तथा खाके खींचने चाहिए। स्मरण रहे कि रेखाचित्र तथा खाकों का प्रयोग भाषा, भूगोल, इतिहास तथा गणित एवं विज्ञान आदि सभी विषयों में किया जा सकता है अतः शिक्षक में शीघ्रता तथा तत्परता के साथ रेखाचित्रों तथा खाकों को बनाने की योग्यता होनी परम आवश्यक है। चूँकि रेखाचित्रों तथा खाकों को बनाने में कुछ व्यय नहीं होता इसलिये ज्ञान को स्पष्ट करने के लिये प्रत्येक शिक्षक को सुन्दर तथा आकर्षक रेखाचित्र खींचने तथा आकृतियाँ बनाने का अभ्यास अवश्य करना चाहिए।
(6) ग्राफ (Graph) - ग्राफ का अपना निजी महत्त्व होता है। ग्राफ के प्रयोग से बालकों को भूगोल, इतिहास, गणित तथा विज्ञान आदि अनेक विषयों का ज्ञान सरलतापूर्वक किया जा सकता है। स्मरण रहे कि ग्राफ की सहायता से भूगोल के पाठ में जलवायु, उपज तथा जनसंख्या आदि का ज्ञान दिया जा सकता है तथा इतिहास शिक्षण में इसका प्रयोग स्वतन्त्रता संग्राम की प्रगति तथा धार्मिक अथवा राजनीतिक विकास की प्रगति का ज्ञान देने के लिये किया जाता है। ऐसे ही गणित तथा विज्ञान का शिक्षण करते समय भी ग्राफ का प्रयोग करते हुये अनेक प्रश्नों को हल किया जा सकता है।
(7) चार्ट (Charts) - चार्टों के प्रयोग से शिक्षक को शिक्षण का उद्देश्य प्राप्त करने में बड़ी सहायता मिलती है। ध्यान देने की बात है कि चार्ट का प्रयोग भूगोल, इतिहास, अर्थशास्त्र, नागरिकशास्त्र तथा गणित एवं विज्ञान आदि सभी विषयों में सरलतापूर्वक किया जा सकता है। अतः शिक्षक को पाठ की आवश्यकताओं की दृष्टि में रखते हुये अधिक-से-अधिक चार्ट स्वयं ही तैयार करके उचित ढंग से प्रयोग करने चाहिए। याद रहे कि चार्ट द्वारा प्रदर्शित की हुई विषय-वस्तु इतनी सुन्दर, सुडौल तथा मोटी होनी चाहिए कि कक्षा के प्रत्येक बालक का ध्यान उसकी ओर आकर्षित हो जाये और शिक्षक अपने प्रयोजन को सरलता से स्पष्ट कर सकें
(8) बुलेटिन बोर्ड (Bulletion Board) - बुलेटिन शिक्षा का एक उपयोगी उपकरण है। इस पर देश की राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक समस्याओं के सम्बन्ध में चित्र, ग्राफ, आकृति तथा लेख एवं आवश्यक सूचनाओं को प्रदर्शित करके बालकों की जिज्ञासा को इस प्रकार से उकसाया जाता है कि उनके ज्ञान में निरन्तर वृद्धि होती रहे।
(9) फ्लेनेल बोर्ड (Flannel Board) - आधुनिक युग में फ्लेनेल बोर्ड का भी विशेष महत्त्व है। इसको बनाने में 30 " x 48" के एक प्लाई वुड अथवा हार्ड-बोर्ड के टुकड़ों पर इतनी ही नाप के एक - फ्लेनेल के कपड़े को खींचकर बाँध दिया जाता है। तत्पश्चात् उस पर विभिन्न विषयों से सम्बन्धित चित्र, मानचित्र, रेखाचित्र तथा ग्राफ आदि प्रदर्शित किये जाते हैं। याद रहे कि फ्लेनेल बोर्ड पर प्रदर्शित किये जाने वाले चित्रों तथा मानचित्रों आदि को खुरदरे कागज (सेपड-पेपर) पर गोंद से चिपकाया जाता है।
(10) जादू की लालटेन (Magic Lantern ) - जादू की लालटेन एक चित्र प्रदर्शक यन्त्र है। यह यन्त्र शिक्षण को सजीव एवं प्रभावशाली बनाने में इतना सफल सिद्ध हुआ है कि इसकी उपयोगिता को प्रायः सभी शिक्षास्त्रियों ने स्वीकार किया है। स्मरण रहे कि जादू की लालटेन को प्रयोग में लाने के लिये स्लाइडों की आवश्यकता पड़ती है अतः यदि बालकों को दिन में विभिन्न विषयों की शिक्षा देने के पश्चात् उसी के सम्बन्ध में रात्रि को स्लाइडें दिखा दी जायें तो उनको ज्ञान को ग्रहण करने में आसानी हो जायेगी और वे उसे कभी नहीं भूलेंगे।
(11) चित्र विस्तारक यन्त्र (Epidiascope ) - चित्र विस्तारक यन्त्र पाठ को अधिक स्पष्ट तथा रोचक बनाने के लिये जादू की लालटेन की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली यन्त्र है। इसका कारण यह है कि जादू की लालटेन में चित्रों को दिखाने से पहले स्लाइडें बनाने की आवश्यकता पड़ती है। यह बात चित्र विस्तारक यन्त्र के साथ नहीं है। चित्र विस्तारक यन्त्र में छोटे-छोटे चित्रों, मानचित्रों, पोस्टरों तथा पुस्तक के पृष्ठों को कमरे में अन्धेरा करके चित्रपट अथवा पर्दे पर बिना स्लाइडें बनाये हुये ही बड़ा करके दिखाया जा सकता है।
(12) स्लाइडें, फिल्म-पट्टियाँ तथा प्रक्षेपक (Slides, Film-strips and Projector ) - स्लाइडों के द्वारा विभिन्न विषयों की सूक्ष्म से सूक्ष्म बातों को पर्दे पर बड़ा करके दिखाया जा सकता है। स्लाइडों को दिखाते समय शिक्षक पाठों की कठिन तथा बारीक बातों को अपने कथन द्वारा स्पष्ट करता जाता है। इससे पाठ सरल तथा रोचक बन जाता है और बालक ज्ञान को आसानी से ग्रहण कर लेता है। फिल्म पर बनी हुई स्लाइडों को फिल्म-पट्टी की संज्ञा दी जाती है। फिल्म पट्टी को बनाने के लिए प्रायः किसी पाठ से सम्बन्धित 15 अथवा 20 स्लाइडों को 35 mm की फोटोग्राफी की फिल्म पर बनी हुई स्लाइडों की फिल्म-पट्टी को कक्षा के सामने चित्रप्रदर्शक (Projector) द्वारा पर्दे के ऊपर करके दिखाया जाता है। इससे पाठ में सजीवता आ जाती है।
(13) मूक- चित्र (Soundless Motion Picture ) - मूक - चित्र चलचित्र का पहला रूप है। इससे क्रियाएँ तो पूरी दिखायी जाती हैं परन्तु ध्वनि नहीं होती। दूसरे शब्दों में, मूक- चित्र द्वारा विभिन्न विषयों तथा क्रियाओं जैसे-सफाई के साधन, विभिन्न रोगों से बचने के उपाय तथा प्राकृतिक दृश्यों एवं वर्णनों को क्रिया रूप में आसानी से स्पष्ट किया जाता है। अतः चित्र विस्तारक यन्त्र तथा प्रक्षेपक यन्त्रों की अपेक्षा मूक- चित्रों का शिक्षण में विशेष महत्त्व है।
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