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बी एड - एम एड >> बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षणसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर
प्रश्न- व्याकरण के प्रकार का संक्षिप्त परिचय दीजिये।
उत्तर-
व्याकरण के प्रकार
आज ज्ञान के क्षेत्र में विस्फोट हो रहा है। सभी अध्ययन क्षेत्रों में ज्ञान में वृद्धि अधिक तीव्रता से हो रही है। इसका प्रभाव व्याकरण के ज्ञान पर भी हुआ है। चौमस्की ने एक नवीन व्याकरण का विकास किया है जिसे "व्यावहारिक व्याकरण" (Functional Grammar) की संज्ञा दी जाती है। इस प्रकार के व्याकरण में नियमों के अनुसरण की अपेक्षा 'व्यावहारिकता' अथवा प्रचलन को विशेष महत्त्व दिया है। इस प्रकार आज व्याकरण के तीन प्रकार हैं-
(1) शास्त्रीय या सैद्धान्तिक व्याकरण - विद्वानों ने वाक्य संरचना, ध्वनि, स्वर आदि के व्याकरण के नियमों एवं सिद्धान्तों की रचना की है। इनका ज्ञान छात्रों को दिया जाता है। साथ ही उनके प्रयोग को उदाहरणों से स्पष्ट किया जाता है तथा छात्रों को भी अवसर दिया जाता है। वे भी वाक्य संरचना में उनका प्रयोग करें तथा वाक्य की संरचना में घटकों, कर्त्ता, क्रिया, कर्म, विशेषण, संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया-विशेषण की पहचान करें। व्याकरण के नियमों को विशेष महत्त्व दिया जाता है। इनकी भाषा की शुद्धता को प्राथमिकता दी जाती है।
(2) व्यावहारिक व्याकरण - इस व्याकरण के स्वरूप का विकास चौमस्की ने किया है जिसमें नियमों की अपेक्षा व्यावहारिकता को अधिक महत्त्व दिया है। मातृभाषा के बोलने में व्याकरण के नियमों का प्रयोग बहुत कम होता है जबकि सम्प्रेषण बोधगम्य एवं मितव्ययी होता है। बिना कर्त्ता के "क्रिया' के प्रयोग से सम्प्रेषण हो जाता है। पूर्ण वाक्य की अपेक्षा अधूरा वाक्य ही सम्प्रेषण के लिये पर्याप्त होता है। इससे भाषा की शुद्धता की अपेक्षा सम्प्रेषण की बोधगम्यता को महत्त्व दिया जाता है।
(3) प्रासंगिक व्याकरण - इस प्रकार के व्याकरण में शुद्ध, स्पष्ट अभिव्यक्ति पर अधिक बल दिया जाता है। इसमें भाषा की दृष्टि से अशुद्धियाँ रहती हैं परन्तु अपेक्षाकृत कम रहती हैं। गद्य साहित्य में कहानीकार, नाटककार तथा उपन्यासकार भाषा की शुद्धता पर ध्यान देते हैं अपितु सम्प्रेषण की प्रभावशीलता एवं अभिव्यक्ति पर विशेष ध्यान देते हैं।
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