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बी एड - एम एड >> बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षणसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर
प्रश्न- व्याकरण शिक्षण की विभिन्न विधियों का वर्णन उदाहरण सहित कीजिये। ।
अथवा
व्याकरण शिक्षण की किसी एक विधि का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
सम्बन्धित लघु उत्तरीय प्रश्न
1. व्याकरण शिक्षण की विधियों का वर्णन कीजिये।
उत्तर-
व्याकरण शिक्षण की विधियाँ
व्याकरण शिक्षण के लिये निम्नलिखित विधियों का प्रयोग किया जाता है-
1. निगमन विधि अथवा सिद्धान्त विधि-
(अ) सूक्ष्म विधि,
(ब) पाठ्य विधि।
2. आगमन विधि-
(अ) प्रयोग विधि,
(ब) सहयोग विधि / सहसम्बन्ध विधि |
3. प्रत्यक्ष भाषा - शिक्षण विधि।
व्याकरण-शिक्षण में निगमन विधि तथा आगमन विधियों का प्रयोग अधिक होता है तथा यह विधियाँ अधिक व्यावहारिक भी हैं। व्याकरण नियमों को बतलाकर उन्हें उदाहरण दिये जाते हैं। इन्हें नियम-उदाहरण- विधि भी कहते हैं। आगमन विधि को उदाहरण-नियम विधि भी कहते हैं।
निगमन विधि (Deductive Method) - इस विधि को 'नियम उदाहरण' विधि भी कहते हैं। इसमें छात्रों को पहले नियम समझा दिये जाते हैं, उसके बाद उदाहरण से उस विषय का प्रयोग करके दिखाया जाता है। इसमें नियम को पूर्ण रूप में प्रस्तुत करके उदाहरण को अपूर्ण रूप में रखकर छात्रों से पूर्ति कराते हैं या उदाहरण से स्पष्ट करते हैं। संज्ञा के शिक्षण हेतु नियम के अन्तर्गत परिभाषा सिखाते हैं। नियम - " संज्ञा उन शब्दों को कहते हैं जिसमें किसी व्यक्ति, स्थान या वस्तु का बोध होता है। " इसके बाद छात्रों को वाक्यों में संज्ञा को पहचानने को कहा जाता है।
उदाहरण- " छात्र व्याकरण की पुस्तक का अध्ययन कर रहे हैं।
इस वाक्य में 'छात्र' तथा 'पुस्तक' संज्ञा प्रस्तुत की गई है इसके लिए अन्य उदाहरण अलंकार के शिक्षण में निगमन विधि है।
नियम - "काव्य में जिन शब्दों से उसकी शोभा बढ़ती है उन्हें अलंकार कहते हैं।" इसमें नियम - उदाहरण सूत्र उपयोग करते हैं।
उदाहरण-
तीन बेर खाती तें वे तीन बेर खाती है,
नगन जड़ाती ते वे नगन जड़ाती है।
इसमें एक शब्द दो बार प्रयुक्त किया परन्तु दोनों स्थानों पर उसका अर्थ भिन्न-भिन्न है जिससे कविता की सुन्दरता बढ़ती है, इन्हें अलंकार कहते हैं। इस विधि को सूत्र विधि भी कहते हैं।
(अ) सूत्र प्रणाली - इसके अनुसार-, व्याकरण के नियम सूत्र रूप में रटा दिये जाते हैं और उनके लक्षण तथा उदाहरण बता दिये जाते हैं। यह प्रणाली अमनोवैज्ञानिक और परम्परागत संस्कृत व्याकरण-शिक्षण की ही नकल है जहाँ बालक संस्कृत भाषा में कुछ बोलने, लिखने और समझने का ज्ञान प्राप्त किये बिना ही लघु कौमुदी के सूत्रों को रटना प्रारम्भ कर देते हैं। इस प्रणाली से भाषा के प्रयोग का ज्ञान और अभ्यास नहीं हो पाता।
(ब) पाठ्य-पुस्तक प्रणाली - इस प्रणाली में भी व्याकरण की पुस्तक दी गई परिभाषाओं और सिवन्त रटा दिये जाते हैं। संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया, विशेषण आदि की परिभाषा और भेद छात्रों को बता दिये जाते हैं। इस प्रणाली से भी भाषा के प्रयोग का अभ्यास नहीं होता और बालक केवल व्याकरणिक नामों को याद करके संतोष कर लेता है। निगमन या सिद्धान्त प्रणाली दोषपूर्ण प्रणाली है। अत- उसकी जगह आगमन प्रणाली का प्रयोग वैज्ञानिक और उपयोगी माना जाता है।
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