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बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :180
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2760
आईएसबीएन :0

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बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर

प्रश्न- आगमन विधि की व्याख्या कीजिये।

उत्तर-

आगमन विधि
(Inductive Method)

आगमन तथा निगमन शिक्षण विधियाँ अधिक प्राचीन हैं। आज भी इनका प्रयोग शिक्षण में किया जाता है। आगमन विधि मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित है। यह एक मनोवैज्ञानिक तथा शिक्षण की स्वाभाविक विधि है क्योंकि छात्रों का ज्ञान वस्तुओं के निरीक्षण पर निर्भर होता है। जिन वस्तुओं को देखता है उनके सम्बन्ध में 'क्या, क्यों तथा कैसे'? प्रश्न करता है। इन्हीं प्रश्नों के उत्तरों से नियमों तथा सिद्धान्तों का प्रतिपादन करता है। मातृभाषा शिक्षण में इसका विशेष महत्त्व है। इस विधि में 'सीखने' को विशेष महत्त्व दिया जाता है। इस विधि से छात्रों की सृजनात्मक योग्यता का विकास होता है।

आगमन विधि में तर्क का प्रयोग अधिक होता है, जैसे-

1. पुस्तक लाल है, पेन्सिल काली है, स्याही नीली है। पुस्तक, पेन्सिल तथा स्याही को व्याकरण में क्या कहते हैं?

उत्तर- संज्ञा।

2. कौटिल्य नश्वर है, युधिष्ठर नश्वर है, पाणिनी नश्वर है, पतंजलि नश्वर है। यह सभी मनुष्य हैं इसलिये सभी मनुष्य नश्वर हैं।

संज्ञा की विशेषता बताने वाले शब्द को विशेषण कहते हैं।

इस विधि को 'उदाहरण- नियम' विधि भी कहते हैं। इसमें कई उदाहरण देकर उनमें नियम का प्रतिपादन किया जाता है। निगमन विधि में अलंकार के दो उदाहरण दिये गये हैं। इन्हें पहले दिया जाये तथा छात्रों से पूछा जाये कि यह पढ़ने में क्यों अच्छे लगते हैं? इस कविता की सुन्दरता कैसे बढ़ गई? शब्दों तथा अक्षरों से प्रारम्भ होने की पुनरावृत्ति हुई है। शिक्षक को बताना होगा जिन शब्दों या अक्षरों से कविता या काव्य की सुन्दरता बढ़ती है उन्हें अलंकार कहते हैं।

आगमन विधि के दो प्रकार हैं-

(अ) प्रयोग प्रणाली के अनुसार- व्याकरण पढ़ाते समय छात्रों के सम्मुख पहले उदाहरण रखे जाते हैं। अनेक उदाहरणों में समान लक्षणों वाले अंशों के कार्य एवं गुण छात्रों से कहलाये जाते हैं। अंत में उन्हीं के द्वारा कही हुई बातों के आधार पर सिद्धान्त या नियम निकलवाये जाते हैं और फिर उन्हीं से उनका प्रयोग तथा अभ्यास कराया जाता है।

अतः इस प्रणाली में निम्नलिखित सोपानों तथा पदों का अनुसरण करना पड़ता है-

(1) उदाहरण - प्रस्तुत प्रकरण से सम्बन्धित अनेक उदाहरण बच्चों के सम्मुख प्रस्तुत करना।

(2) तुलना एवं विश्लेषण - उन उदाहरणों की परस्पर तुलना करना विश्लेषण करना और उनसे व्यक्त समान लक्षणों एवं परिभाषाओं को समझना।

(3) नियमीकरण या निष्कर्ष - लक्षणों एवं विशेषताओं के आधार पर नियम, निष्कर्ष या परिभाषा निकालना।

(4) प्रयोग और अभ्यास - निकाले गये निष्कर्ष या नियम की पुष्टि के लिये अनेक प्रयोग करना और उसका अच्छी तरह अभ्यास करना।

इन सोपानों के अनुसरण से व्याकरण की शिक्षा द्वारा भाषा का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त होता है। उदाहरण के लिए, यदि बालक को संज्ञा का ज्ञान प्रदान करना होता है तो संज्ञा प्रयुक्त वाक्य छात्रों के सामने प्रस्तुत किये जायेंगे और उनके आधार पर किसी वस्तु या व्यक्ति के नाम का संज्ञा बताने का प्रयत्न किया जायेगा। वर्तमान काल में क्रिया का लिंग और वाचनकर्त्ता के लिंग और वचन के अनुसार- होता है तो शिक्षक इस नियम को न बताकर उचित उदाहरण पहले रखेगा।

1. छात्र पुस्तकें पढ़ते हैं।
2. छात्रायें पुस्तक पढ़ती हैं।
3. मोहन पुस्तक पढ़ाता है।
4. सीता पुस्तक पढ़ती है।

इनके आधार पर प्रश्नों द्वारा शिक्षक छात्रों से यह निष्कर्ष निकलवा लेगा कि प्रति वाक्य में कर्त्ता का जो लिंग और वचन है, वही क्रिया का भी है। इस प्रकार इसका नियमीकरण छात्र स्वयं ही कर लेंगे, फिर शिक्षक छात्रों को इस आधार पर अनेक प्रयोग लिखने को कहेगा जिसमें इस प्रकार के प्रयोगों के अभ्यस्त हो जायें और कभी भी भूल न करें।

सह-सम्बन्ध विधि - इस विधि के व्याकरण के नियमों को अधिक बोधगम्य कराया जाता है . क्योंकि इस विधि में उनकी सार्थकता एवं उपयोगिता का अनुभव कराया जाता है। यह आगमन विधि का ही एक रूप है। गद्य-शिक्षण तथा रचना-शिक्षण के साथ व्याकरण के नियमों का बोध कराया जाता है। सूक्ष्म तथा अमूर्त नियमों का ज्ञान उदाहरणों से दिया जाता है।

इसके अन्तर्गत व्याकरण की शिक्षा अलग से देने की आवश्यकता नहीं है बल्कि रचना - शिक्षण एवं -गद्य-शिक्षण के साथ ही यथा प्रसंग होती चलती है। इसके उदाहरण हमें शब्द-शिक्षण, वर्तनी - शिक्षण, उच्चारण-शिक्षण, वाक्य रचना-शिक्षण, अनुच्छेद रचना-शिक्षण प्रसंग में दिये जा चुके हैं। गद्य-शिक्षण में अनेक प्रसंग आते हैं जिनका लाभ उठाकर शिक्षक व्याकरणिक रूपों और नियमों का ज्ञान प्रदान कर सकता है। इस विधि की व्यावहारिकता अधिक है।

प्रत्यक्ष भाषा शिक्षण विधि
(Direct Language Teaching Method)

यह व्याकरण - शिक्षण की उत्तम विधि मानी जाती है क्योंकि यह मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित है। अक्सर बालक भाषा को अनुकरण के आधार पर सीखते हैं। घर तथा परिवार में जो भाषा बोली जाती है, उसे बालक स्वाभाविक ढंग से सीख लेते हैं। इसी प्रकार भाषा का व्याकरण भी अनुसरण द्वारा सीख लेते हैं। नियमों को पढ़ने, समझने की आवश्यकता नहीं होती है।

शोध कार्यों द्वारा यह निष्कर्ष प्राप्त हुये हैं कि बालक उस भाषा को शीघ्र सीख लेते हैं जिसको व्याकरण भाषा सीखने के बाद सिखाया जाता है। अंग्रेजी माध्यम विद्यालय में भाषा-शिक्षण प्रत्यक्ष विधि द्वारा दिया जाता है और व्याकरण अथवा वाक्य संरचना का ज्ञान भाषा सीखने के बाद दिया जाता है। अनुवाद विधि (Translation Method) में भाषा सीखने से पूर्व व्याकरण सिखाया जाता है। इसमें छात्रों को व्याकरण के नियमों को रटना पड़ता है। भाषा सीखने में स्वाभाविकता नहीं होती है। कृत्रिमता अधिक होती है क्योंकि छात्र व्याकरण के नियमों में उलझा रहता है। भाषा के बोलने में प्रवाह नहीं आ पाता है। भाषा सीखने के लिए यह आवश्यक नहीं कि पहले उसे भाषा की संरचना का ज्ञान दिया जाये। भाषा सीखने में अनुकरण विधि अधिक उपयोगी एवं प्रभावशाली होती है।

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