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बी एड - एम एड >> बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षणसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर
प्रश्न- रस का अर्थ एवं परिभाषा लिखिये एवं रस शिक्षण के उद्देश्य लिखिये।
उत्तर-
रस का अर्थ एवं परिभाषा - गद्य / काव्य के पठन-पाठन श्रवण अथवा दर्शन आदि से पाठक, स्रोता अथवा नाटक के दर्शक को जो अवर्णनीय अलौकिक आनन्द की अनुभूति होती है उसे उस साहित्य का निहित रस कहते है। इस रस को ब्रह्मानन्द स्वादसहोदर कहा गया है।
आचार्य भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में रस की परिभाषा निम्नप्रकार दी है- "विभावानुभाव व्यभिचारे संयोगाद्रसनिष्यति” अर्थात विभाव, अनुभाव और व्याभिचारी (संचारी) भावों के संयोग के रस की निष्पत्ति होती है। आचार्य विश्वनाथ ने अपने 'साहित्य दर्पण' में रस को परिभाषित करते हुए लिखा है कि सहृदय के हृदय में वासना रूप से विद्यमान स्थायी भाव जब विभाव अनुभाव और व्यभिचार भावों से अभिव्यक्त हो उठते हैं तब आस्वाद या आनन्द रूप हो जाती हैं और रस कहलाते हैं।
रस शिक्षण के उद्देश्य - रस शिक्षण के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
(1) छात्रों को हिन्दी शिक्षण में रस के महत्व से अवगत कराना।
(2) छात्रों को नवरसों के साथ वात्सल्य एवं भक्ति के दो अतिरिक्त रसों के अवयवों विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी तथा संचारी भाव एवं स्थायी भाव का उदाहरण सहित सम्यक ज्ञान कराना।
(3) छात्रों को हिन्दी गद्य, पद्य, नाटक, कहानी आदि की पाठ्यक्रम में निर्धारित की गई सामग्री में निहित रस- परिपाक का ज्ञान कराना।
(4) छात्रों को पद्यांशों की व्याख्या के दौरान उसके कलापक्ष के अन्तर्गत रसों की अनुभूति कराना।
(5) छात्रों को काव्य, कहानी या नाटक आदि में निहित रसों की पहचान करने का अभ्यास कराना।
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