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बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :180
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2760
आईएसबीएन :0

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बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर

प्रश्न- बच्चों को शुद्ध उच्चारण की शिक्षा किस प्रकार देनी चाहिए? 

अथवा
हिन्दी भाषा शिक्षण में शुद्ध उच्चारण हेतु सुझाव दीजिए।

उत्तर-

बच्चों को शुद्ध उच्चारण की शिक्षा

भाषा मानव मन के भावों की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। यह अभिव्यक्ति दो रूपों में होती है- मौखिक तथा लिखित। बालक जैसा सुनता है वैसा ही बोलने का प्रयास करता है। इस प्रक्रिया में उच्चारण का विशेष महत्त्व होता है।

रामकृष्ण कुलश्रेष्ठ के शब्दों में- "व्याकरण से भी दुगना महत्त्व उच्चारण का है। एक सु-उच्चरित वाक्य व्याकरण असम्मत रहने पर भी अर्थ प्रदान करता है, किन्तु पूर्ण व्याकरण सम्मत वाक्य अशुद्ध उच्चरित होने पर श्रोता समझ नहीं पाता या अपूर्ण रूप से समझता है अथवा प्रयत्न करके ही समझ पाता है। "

शुद्ध उच्चारण की शिक्षा-शुद्ध उच्चारण शिक्षण प्रारम्भिक स्तर से ही प्रारम्भ होना चाहिए। बालक को प्रारम्भ से ही जिस तरह के उच्चारण की आदत पड़ जाती है वह आजीवन बनी रहती है। अतः बालक में शुद्ध उच्चारण की आदत के लिए निम्नांकित विधियों का प्रयोग करना चाहिए

(1) अभ्यास विधि - शुद्ध उच्चारण का एक मात्र सशक्त उपाय है- बार - बार अभ्यास करना। कहा भी जाता है- "करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।"

(2) अनुकरण विधि - इस विधि में अध्यापक के द्वारा आदर्श पाठ का उच्चारण बार-बार छात्रों द्वारा करवाया जाता है। छात्रों को शुद्ध उच्चारण वाले कैसेट्स सुनाकर उनका अनुकरण करवाया जाये।

(3) स्थान परिवर्तन विधि - यदि छात्रों का सम्बन्ध ऐसे व्यक्तियों से अधिक है जिनका उच्चारण अशुद्ध है तब छात्रों को ऐसे स्थान से हटा देना चाहिए अन्यथा उनकी उच्चारण सम्बन्धी त्रुटिपूर्ण आदत में सुधार करना कठिन होगा।

(4) सुधार विधि - इसके लिए अध्यापक व्यक्तिगत रूप से उस छात्र को जिसने अशुद्ध उच्चारण किया है, शुद्ध उच्चारण के लिए प्रेरित करेगा तथा उसकी सहायता भी करेगा और शुद्ध उच्चारण करने के लिए सम्पूर्ण कक्षा को सामूहिक रूप से बोलने के लिए कहेगा।

(5) वाक्य संशोधन विधि - इससे छात्रों का उच्चारण तो शुद्ध होगा ही साथ ही उनमें भाषा समझने की शक्ति का भी विकास होगा।

(6) निदानात्मक परीक्षण एवं उपचारात्मक शिक्षण विधि - निदानात्मक परीक्षण द्वारा बालकों की अशुद्धियों के स्थल विशेष की पहचान और उनके कारणों की खोज में सहायता मिलती है। उसके आधार पर उपचारात्मक अभ्यास मालायें तैयार करके छात्रों को शुद्ध उच्चारण का अभ्यास किया जाना चाहिए।

(7) निरीक्षण विधि - नये-नये स्थानों और वस्तुओं को दिखाकर छात्रों को उनके नामों से अवगत करवाया जाये। इससे वे शुद्ध उच्चारण सीखेंगे और उनके शब्द भण्डार में वृद्धि होगी।

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