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बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण

सरल प्रश्नोत्तर समूह

प्रकाशक : सरल प्रश्नोत्तर सीरीज प्रकाशित वर्ष : 2023
पृष्ठ :180
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 2760
आईएसबीएन :0

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बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर

प्रश्न- श्रव्य दृश्य सामग्री के कार्य बताइये।

अथवा
हिन्दी शिक्षण में श्रव्य-दृश्य सामग्री का क्या महत्त्व है? स्पष्ट कीजिए। (कानपुर 2015)

उत्तर-

श्रव्य दृश्य सामग्री के कार्य

श्रव्य दृश्य सामग्री के अनेक कार्य हैं तथा सभी बालकों की शिक्षा के लिये उपयोगी हैं। छोटे बालकों की शिक्षा में तो इसके महत्त्व को प्रत्येक शिक्षाशास्त्री ने एक मत होकर स्वीकार किया है।

निम्नलिखित पंक्तियों में दृश्य-श्रव्य सामग्री के कार्यों एवं महत्त्व पर विस्तृत रूप से वर्णन किया गया है-

(1) प्रेरणा - श्रव्य दृश्य साधन बालकों का ध्यान आकर्षित करके ज्ञान को मूर्त रूप प्रस्तुत करते हैं इससे बालकों को सिखाने की क्रिया में प्रेरणा एवं उत्सुकता मिलती है। दूसरे शब्दों में दैनिक शिक्षण विधि की अपेक्षा श्रव्य दृश्य सामग्री द्वारा पढ़ाने से बालक पाठ को ध्यानपूर्वक सुनते हैं और आसानी से जल्दी सीख जाते हैं।

(2) क्रिया का सिद्धान्त - श्रव्य दृश्य सामग्री के प्रयोग से बालकों को विविधि प्रकार की क्रियाएँ करने के अवसर मिलते हैं। वे उसमें बोलते हैं, लिखते हैं, प्रश्न पूछते हैं तथा वाद-विवाद करते हैं। इससे उनकी विभिन्न इन्द्रियाँ क्रियाशील हो जाती हैं जिसके परिणामस्वरूप उनकी पाठ में रुचि बनी रहती है और वे खेलते ही खेलते कठिन से कठिन बातों को बिना किसी कठिनाई के स्वाभाविक रूप से सीख जाते हैं।

(3) स्पष्टीकरण - श्रव्य दृश्य सामग्री के प्रयोग से बालकों को कठिन से कठिन पाठ्य सामग्री का स्पष्टीकरण हो जाता है। इसका एक मात्र कारण यह है कि बालक जो सुनते हैं उसी को आँख से भी देख लेते हैं। आँख से देख लेने पर उनकी समस्त शंकायें दूर हो जाती हैं जिसके परिणामस्वरूप वे ज्ञान को स्पष्ट रूप से ग्रहण कर लेते हैं।

(4) सार्थक अनुभव - श्रव्य दृश्य सामग्री द्वारा बालकों को पाठ मूर्त रूप से पढ़ाया जाता है। प्रत्येक बालक वस्तु को देखकर, छूकर, पूछकर हर प्रकार से ठीक-ठीक समझने का प्रयास करता है। इससे पाठ सरल, रोचक तथा मनोरंजक बन जाता है और सभी बालक ज्ञान को प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण कर लेते हैं। दूसरे शब्दों में श्रव्य दृश्य सामग्री के प्रयोग से बालकों के अनुभव उपयुक्त हो जाते हैं। इससे कक्षा में मौलिक चिन्तन को प्रोत्साहन मिलता है। संक्षेप में, श्रव्य दृश्य सामग्री द्वारा प्रत्यक्ष अनुभव का प्रतिनिधित्व सम्भव है।

(The symbolic representation of direct experience is possible by means of Audio-visual Aids.)

(5) रटने को कम करना - श्रव्य दृश्य सामग्री के प्रयोग से बालक पाठ के विकास में रुचि लेते हैं तथा ज्ञान को स्वयं क्रिया करके ग्रहण करते हैं। इससे सीखा हुआ ज्ञान निश्चित और स्थायी बन जाता है और उन्हें किसी चीज को रटने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

(6) शब्दावली में वृद्धि - श्रव्य दृश्य सामग्री के द्वारा बालकों की शब्दावली में वृद्धि होती है। इसका कारण यह है कि वे रेडियो, टेलीफोन तथा चलचित्र का प्रयोग करते समय नये-नये शब्द सुनते हैं तथा ग्रहण करते हैं।

(7) शिक्षण में कुशलता - श्रव्य-दृश्य सामग्री के प्रयोग से शिक्षण में कुशलता आती है, साथ ही शिक्षण और अधिक प्रभावशाली बन जाता है। दूसरे शब्दों में जिन सूक्ष्म बातों तथा कठिन भागों को बालक चॉक और बोलने की सहायता से नहीं समझ पाता उन्हें वे श्रव्य दृश्य सामग्री के प्रयोग से सरलतापूर्वक समझ जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि श्रव्य दृश्य सामग्री के प्रयोग से शुष्क-से-शुष्क तथा अरुचिकर विषयों अथवा उपविषयों को अन्य प्रविधियों की अपेक्षा अधिक सरल, रोचक तथा स्पष्ट बनाया जा सकता है।

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि श्रव्य दृश्य सामग्री के अनेक कार्य हैं तथा इसका बालकों की शिक्षा में महत्त्वपूर्ण स्थान है। हर्ष का विषय है कि हमारी केन्द्रीय तथा प्रदेशीय सरकारों ने भी अन्य देशों की भाँति शिक्षण की क्रिया को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिये श्रव्य दृश्य सामग्री के महत्त्व को स्वीकार किया है। इससे अब देश के विभिन्न भागों में श्रव्य दृश्य सामग्री के निर्माण एवं प्रयोग की शिक्षा देने के लिये अनेक विभाग तथा प्रशिक्षण केन्द्र तीव्र गति के साथ स्थापित किये जा रहे हैं।

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